विशेषः उम्मीदों की सूखती फसल

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कृषि क्षेत्र में सक्रिय निजी कंपनियों का नेटवर्क इतना मजबूत है कि वह छत्तीसगढ़ के उन जंगलों तक पहुंचा है, जहां के घने जंगल को चीर कर सूर्य की रोशनी तक ठीक से नहीं पहुंच पाती और जहां तक सरकारी व्यवस्था की बात है, तो उसकी पहुंच वहां तक होने की बात ही बेमानी है। हाल ही में बस्तर के किसानों को बीज बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी बायर सीड्स प्रा। लिमिटेड ने करैले का उन्नत बीज बेचा। दावा था कि इस बीज से रिकार्ड उत्पादन होगा। किसान मुनाफा कमाने के झांसे में आकर बीज खरीद लिए लेकिन बाद में ठगा महसूस करने लगे। कारण कि इस बीज से जो पौधे तैयार हुए उसमें फूल तो खिले लेकिन फल नहीं लग पाया। एक किसान पितांबर दास कोंडागांव के जिलाधिकारी नीलकंठ टेकाम से इसकी शिकायत जनदर्शन में की, टेकाम एक संवेदनशील तथा कर्मठ अधिकारी के रूप मे जाने जाते हैं , उन्होंने इस पर कड़ी कार्यवाही करने का भरोसा भी दिया है, इस ग़रीब किसान का भविष्य क्या होगा यह तो अब आगे की कार्यवाही ही बताएगी , लेकिन अब तक का कुल नतीजा सीफर ही रहा।
शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बस्तर अंचल के लोगों को सौगातों की पोटली बांटी, लेकिन यह सौगात तब यहां के लोगों के लिए सही मायने में उपयोगी हो सकते हैं, जबकि यहां की मूल समस्याओं का निराकरण किया जाए और इन समस्याओं के प्रति ना राज्य सरकार और ना ही केंद्र सरकार सजग दिखती है। प्रधानमंत्री ने आठ परियोजनाओं का श्रीगणेश किया, लेकिन इन आठ परियोजनाओं में से एक भी ऐसी परियोजना नहीं है जो यहां के मूल निवासियों अर्थात आदिवासी बहुल क्षेत्र के लोगों की आजीविका से संबंधित हो अर्थात खेती-किसानी से हो। संचरनात्मक ढांचा के विकास की बात करना उन्हें अमली जामा पहनाना, निःसंदेह अच्छी बात है, इससे क्षेत्र का विकास होगा, लेकिन जो मौलिक और रोजमर्रा की दिक्कतें है उन्हें दूर करने के प्रति राज्य व केंद्र की सरकारें उदासीन ही दिखी।यह स्थिति सिर्फ इस अति पिछड़े क्षेत्र बस्तर की ही नहीं बल्कि पूरे देश की है, आज भी किसान के पास कोई ऐसा तंत्र नहीं है जो यह तय कर सके कि उसके उत्पाद का उचित मूल्य आज किस बाजार में क्या है और भविष्य में मूल्य घटने-बढ़ने की क्या संभावनाएं हैं? जब वह अपने उत्पाद को मंडी में ले जाता है तब उसे उस दिन का भाव पता चलता है। उत्पाद को पुनः घर वापस लाने पर किराया-भाड़े का बोझ, परेशानी आदि को देख मजबूर होकर क्रेता के चुंगल में फंसता है और क्रेताओं कासंगठित गिरोह उसके उत्पाद का मनमाने दामों में क्रय कर लेते हैं। इसलिए किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिलने के लिए उन्हीं के मध्य व्यक्तियों के माध्यम से कोई सम-सामयिक रणनीति बनाई जानी चाहिए।
मंडी में गोदामों में सहकारी समितियों के माध्यम से यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि यदि किसी दिन किसान को उसके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है तो उसके उत्पाद का भंडारण सहकारी क्रय-विक्रय समितियों के गोदामों में कर दिया जाए और उसके उस दिन के ताजा मूल्य 50 से 80 प्रतिशत अग्रिम दे दिया जाए ताकि वह अपने घरेलू व सामाजिक कार्य को कर सके। जब बाजार मूल्य उच्च स्तर पर हो तो बिक्री कर समिति का किराया और लिए गए अग्रिम को वापस कर अपनी बचत पूंजी को अपने उपयोग में ला सके।
अगर किसानों की खेती की पूरी प्रक्रिया की बात करें तो वह हर कदम पर चुनौतियां झेलता है और ठगा जाता है, खेत को खेती के लिए तैयार करने के लिए जब बीज खरीदता है, तब ठगा जाता है, सिंचाई के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाता, नकली और जहरीले रसायनों वाले खाद से उसका सबाका पड़ता है और किसी तरह जब फसल तैयार हो जाती है तो बेचने के लिए बाजार में बिचौलिये उनका दोहन करते हैं। यानि हर जगह किसान को लूटने की व्यवस्था व्यवस्थित तरीके से संचालित हो रही है। इस बीच प्रधानमंत्री ने घोषणा कर रखी है कि फसल लागत का डेढ़ गुना मुनाफा किसानों को सुनिश्चित करने के साथ वर्ष 2022 तक उनकी आय दो गुनी कर दी जाएगी। लेकिन इस घोषणा के एक साल से अधिक समय होने को आये लेकिन इस दिशा में क्या काम किया गया है, यह बताने के स्थिति में केंद्रीय कृषि मंत्रालय स्थिति में नहीं है, ऐसे में उम्मीदें टूटेगी नहीं तो क्या होगा। सरकारों का रवैया, लोकतांत्रिक ना हो कर राजशाही की तरह होती जा रही है और किसान तथा सर्वहारा वर्ग पीसता जा रहा है।,और आज के ढेर सारे समाचार पत्रों के पहले पन्ने पर मोदी जी की मुस्कुराती हुई तस्वीर कोई तसल्ली नहीं देती बल्कि मुँह चिढ़ाती हुई सी लगने लगती है।

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