मानवीय मूल्यों को धर्म की राजनीति से पृथक करता है ‘ नक्काश ‘

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दोपहर संवाददाता
मुंबई। निर्माता गोविन्द गोयल, पवन तिवारी, जैग़म इमाम की फ़िल्म ‘ नक्काश ‘ में निर्देशक जैग़म इमाम ने देश के उलझे हुए धार्मिक और सामाजिक ढाँचे में मानवीय मूल्यों की कहानियों को बेहद ही प्रभावशाली ढंग से पेश किया है। इस फ़िल्म के ज़रिये निर्देशक जैगम इमाम आज के माहौल में हिन्दू मुस्लिम रिश्तों की बुनियाद को टटोलते हैं और समझाने की कोशिश करते हैं कि राजनीतिक दांव से मानवता को कैसे ज़िंदा रखा जाए।
फ़िल्म में दिखाया गया है कि बनारस में अल्लारखा सिद्दीकी (इनामुलहक़) पीढ़ियों से नक़्क़ाशी का कार्य करता है। अल्लारखा के हुनर और ईमानदारी के लिए वेदांती ( कुमुद मिश्रा ) के मन में बहुत सम्मान और स्नेह है। वेदांती अपने मंदिर के गर्भगृह के नक़्क़ाशी के काम के लिए अल्लारखा को चुनते हैं क्योकि वह मानते है की ईश्वर मनुष्य में भेदभाव नहीं करता। बिगड़ते हुए धार्मिक उन्माद में अल्लारखा वेदांती की सलाह पर मंदिर में जाने से पहले अपने कपडे बदलता है और अपने धार्मिक चिन्ह को भी छुपाता है। एक दिन अल्लारखा को मंदिर से बाहर निकलते समय पुलिस पकड़कर ले जाती है। इंस्पेक्टर ( राजेश शर्मा ) अल्लारखां को प्रताड़ित करता है। पूरी घटना की जानकारी मिलने पर वेदांती थाने जाकर इंस्पेक्टर को मानवता समझाते हुए धार्मिक भेदभाव को अनुचित ठहराते हैं।
अल्लारखां का एक बहुत करीबी दोस्त समद (शारिब हाशमी) है जो शहर में रिक्शा चलाता है। समद अपने पिता को हज कराना चाहता है लेकिन ग़रीबी की वज़ह से वह ऐसा नहीं कर पाता है। अल्लारखाँ का एक बेटा मोहम्मद है। अल्लारखां बेटे को मदरसे में दाखिल करना चाहता है लेकिन मौलवी दाखिला के इसलिए नकार देता है क्योंकि वह गैर धर्म में नक़्क़ाशी का काम करता है। मोहम्मद की देखभाल के लिए अल्लारखा दूसरी शादी के लिए लख़नऊ चला जाता है। इस बीच समद अपने पिता को हज कराने के लिए अल्लारखाँ के घर से मंदिर के गहने चुरा लेता है। समद को पुलिस पकड़ लेती है। अल्लारखाँ समद की चोरी का इल्ज़ाम खुद लेता है। लेकिन वेदांती को विश्वास नहीं है वह अल्लारखाँ से सच्चाई पता कर लेते है समद को पुलिस ले जाती है और उसके पिता का हज़ अधूरा रह जाता है। कुछ महीने बाद कहानी में काफी कुछ बदल गया है समद एक सम्मानित मुस्लिम धर्म गुरु बन गया है। वेदांती के बेटे मयंक त्रिपाठी ( पवन तिवारी ) को अपने कट्टर हिन्दू छवि की वजह से स्थानीय चुनावों में बड़ी पार्टी का टिकट मिलना तय है। लेकिन इस बीच अप्रत्याशित घटनाएं होती है धार्मिक राजनीतीक पार्टी के मुखिया ( अनिल रस्तोगी ) मयंक को उनके राजनैतिक करियर के ग्रहण की चेतावनी देते है फिल्म की कहानी तेजी से बदलती है।
फिर धन के लालच में एक दोस्त की दग़ाबाज़ी और एक राजनेता की आपराधिक छवि आज की सच्चाई बयां कर जाती है।
अभिनय की बात की जाए तो अल्लारखाँ के क़िरदार को अभिनेता इनामुलहक़ ने सहज भाव के साथ संजीदा अभिनय किया है। शारिब हाशमी का किरदार कई रंग में नज़र आता है और अंत में सबको हैरत में डाल देता है। कुमुद मिश्रा और राजेश शर्मा को ज्यादा स्कोप नहीं मिल पाया वहीं पवन तिवारी नकारात्मक छवि को पेश करने में कामयाब हुए हैं।

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