शायनिंग इण्डिया वर्सेज़ रीयल इंडिया का सिनेमाई संवाद : ये है इंडिया

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दोपहर संवाददाता
मुंबई। सिनेमा में भारत देश एक केन्द्रिय क़िरदार के तौर पर हमेशा लोकप्रिय रहा है। डीएलबी फिल्म्स के बैनर तले निर्मित निर्माता संदीप चौधरी की फ़िल्म ‘ ये है इंडिया ‘ में कहानी का मुख्य किरदार भारत ही है। शीर्षक और कांसेप्ट से यह फ़िल्म एक देश का गुणगान करने वाली फिल्म प्रतीत होती है लेक़िन अब आप फिल्म देखना शुरू करते है तो ऐसा नहीं है। लेखक निर्देशक लोम हर्ष ने भारत के प्राचीन और समृद्ध परंपरा का गुणगान किया है तो गरीबी, अपराध और अन्य सामाजिक बुराइयों वाले भारत की तस्वीर भी दृढ़ता से दिखाई है।
फ़िल्म की कहानी में 25 साल के एक एनआरआई मिकी उर्फ मिथिलेश कुमार यू.के. में पैदा हुआ है और अपने देश भारत आता है। भारत के वही रूढ़िवादी विचारों को साझा करता है, जो अपनी विशाल जनसंख्या, प्रदूषण और गरीबी के लिए पूरी दुनियाँ में जाना जाता है। हालाँकि इसका दूसरा पक्ष भी है नायक को मीडिया में नया विकास या शायद भारत के ‘एक ही सिक्के के दूसरे पक्ष’ का पता चलता है। मिथिलेश देश में आने के बाद एक राजनैतिक नेता के बिगड़ैल बेटे से भीड़ जाता है। इस लड़ाई में मिकी का दोस्त पंडित ( आशुतोष कौशिक ) भी शामिल हो जाता है। इस बीच मिकी की प्रेमिका डीना उप्पल उसे देश या खुद में से किसी एक को चुनने की शर्त रखती है। मिकी इण्डिया यानी देश को चुनता है। देश में व्याप्त गंदगी, बेरोजगारी जैसी समस्याओं के लिए मिकी के पास बड़ा आयडिया है।
मिकी को लोग और मिडिया ने सुपर इंडियन बना दिया है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी है जो मिकी की लोकप्रियता से खुश नहीं है। इस बीच कुछ अप्रत्याशित घटनायें हो जाती है। फिर किसी तरह मिकी देश के प्रधानमंत्री से मुलाकात करता है और विश्व शांति सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व करता है।
मुख्य भूमिका में अभिनता गैवी चहल ने मिकी की भूमिका में बेहद ही स्वाभाविक किरदार निभाया है, देश के प्रति उनके जनून को उनके संवादों में देखा जा सकता है। उनके समक्ष अशुतोष कौशिक भी जमे हैं।प्रधानमंत्री के किरदार में मोहन अगाशे प्रभावशाली उपस्थिति देखी जा सकती है। अभिनेता मोहन जोशी ने सत्ता नशे में चूर एक मंत्री की भूमिका के साथ न्याय किया है। डीना उप्पल और अंतरा बनर्जी भी अपने क़िरदारो में अच्छा अभिनय किया है।
सुरेंद्र पाल, मेजर बिक्रमजीत ने महत्वपूर्ण क़िरदारों जीवंत किया है। अन्य क़िरदारों में विशाल शर्मा, जान ए बोस्टोक, अजीत शिधाय, करमवीर चौधरी, सदानंद शर्मा, देवेश पंवार ने भी बढ़िया काम किया है।
फिल्म का लेखन कही कही पर धीमा है पर फिल्म जिस विषय को केंद्र में रखकर बनायी गयी है वहां फ़िक्शन के लिए बहुत ज्यादा स्कोप नहीं बचता है। निर्देशक लोम हर्ष बहुत ही साहस के साथ भारत देश के ऐसे इमेज की बात करते हैं जिसे हम मिडिया या सार्वजिनक मंच पर साझा करने से बचते हैं लेकिन यह कड़वी सच्चाई है। फिल्म कई सवालों के जवाब को अधूरा छोड़ देती है जिन्हे हमें फिल्म हाल से बाहर की जिंदगी में खोजना होगा। फिल्म का संगीत बहुत ही बढ़िया है जोकि लम्बे समय तक याद रहेंगे।

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