विश्व का विरला उदाहरण है मीरा का समर्पण: संत रमेश भाई ओझा

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माणिक मुंडे लिखित ‘मीरा भक्ती का अमिरस’ और ‘हंस का दंश’ का प्रकाशन

दोपहर संवाददाता
मुंबई। मीरा जैसा समर्पण यह किसी को भी संभव नहीं हैं। वह कन्हैय्या को भूल जाए, इसके लिए अनेक अघोरी प्रयास हुए लेकिन वह किसके भी बहकावे में नहीं आई। वह इतनी समर्पित थी, पूरे विश्व में उसकी भक्ति की महिमा अगाध हैं। ऐसे वचन संत रमेशभाई ओझा ने माणिक मुंडे लिखित ‘मीरा – भक्ती का अमिरस’ इस ग्रंथ का प्रकाशन के दौरान कहे।
कालजयी प्रकाशन द्वारा मुलुंड के ट्रान्सकॉन स्कायसिटी में संपन्न प्रकाशन समारोह में ‘मीरा भक्ती का अमिरस’ और ‘हंस का दंश’ इस ग्रंथ का प्रकाशन महामंडलेश्वर श्री स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरीजी और संत श्री रमेशभाई ओझा के शुभ हाथों हुआ मीरा के जीवन में एक दर्द हैं। उसमें अनंत का महासागर हैं। ब्रम्हस्वरूप मीरा उस रस में समर्पित हुई। उसके जीवन चरित्र से प्रेम की धारा बही। उस सबकुछ मीरा – भक्ती का अमिरस यह ग्रंथ पढ़ने के दौरान पन्ने पन्ने पर महसूस होता हैं। ऐसा महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरी ने कहा। ‘हंस का दंश’ इस ग्रंथ पर माणिक मुंडे ने कहा कि हंस का दंश होते किसी ने देखा नहीं हैं। दंश हुआ उन्होंने कभी भी अपनी वेदना सार्वजनिक नही की। दंश होने के बाद भी आनंदरस देते हैं वहीं सच्चा संत। ह्दय का स्पंदनों को पहचाना तो शब्दों की आवश्यकता नहीं हैं। भावतरंग को पकड़कर तादात्म हुआ तो उसके आगे शब्द भी व्यर्थ रहते हैं। बुद्ध और मीरा इसमें हमें विरोधाभास दिखता हैं क्योंकि हमारी दृष्टी विभाजित हुई हैं। बॉम्बे स्टॉक एक्स्चेंज के प्रबंधक निदेशक और सीईओ आशिष कुमार चौहान ने कहा कि संतपरंपरा ने क्या देखा? वे अनंत में विलीन होते हैं। मीराबाई उसी में से एक। आहारवेद के हरीश शेट्टी ने कहा कि आहारवेदाअंतर्गत अंतर्गत चलाए जानेवाले अभियान में शरीर और ज्ञान के लिए के लिए मुहिम चलाई जाती हैं।
हम प्रकृति के साथ रहते हैं तो प्रकृति हमे संभालती हैं।

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