घटता वोट प्रतिशत चिंता का विषय

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हर चुनाव में नया मतदाता तो उत्साह के साथ मतदान करता है किन्तु पहले वाले निराश होकर घर बैठ जाते हैं। जिन राज्यों या सीटों पर 75 और 80 फीसदी मतदान हुआ वहां के मतदाताओं की जागरूकता का चुनाव आयोग को प्रचार करना चाहिए। लोकतंत्र जनता के द्वारा संचालित तंत्र है। ऐसे में नेतृत्व की चयन प्रक्रिया में चयनकर्ता की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है। देखने में आया है कि मतदान के दिन घर में बैठकर टीवी देखने वाले कथित बुद्धिजीवी ही चुनाव के बाद व्यवस्था नहीं सुधरने को लेकर सबसे ज्यादा मुंह चलाते हैं। पुरानी कहावत थी जैसा राजा तैसी प्रजा। लेकिन आज के जमाने में जैसी प्रजा तैसा राजा होता है। इसलिए राजा या नेता चुनने वाले ही यदि उदासीन हैं तब सत्ता कैसी होगी ये आसानी से समझा जा सकता है।

-डाॅ. श्रीनाथ सहाय
चुनाव आयोग की तमाम कोशिशों के बाद घटता वोट प्रतिशत चिंता का कारण है। लोकसभा चुनाव के तीन चरण बीत गये हैं, लेकिन इन तीनों चरणों में वोट प्रतिशत में कमी रिकार्ड गयी है। गिरता वोट प्रतिशत किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता की बात है। चुनाव आयोग और सरकार की पिछले कई वर्षों से ये लगातार कोशिशें जारी हैं कि वोट प्रतिशत को बढ़ाया जाए। लेकिन ये दुख व चिंता का विषय है कि तमाम कोशिशों व प्रचार के बाद भी वोट प्रतिशत बढ़ने की बजाय घट रहा है। असल में लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक मतदाता का लोकतंत्र में भागीदारी करना बड़ा महत्तवपूर्ण माना जाता है। वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी किसी स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की निशानी है।
लोकसभा के तीन चरणों के मतदान का वोटिंग रूझान देखें तो ऐसा लगता है कि देश के बड़े राज्यों और बड़े शहरों में अभी भी एक तबका मतदान में रूचि नहीं रखता। चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 95 सीटों के लिए हुए चुनाव में औसतन 66 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। इसमें से यदि नोटा में पड़े हुए मत घटा दिए जावें तब तो प्रतिशत और घट जाएगा। यह आंकड़ा भी तब आया जब मणिपुर, पुडुचेरी तमिलनाडु और बंगाल में 75 से 80 प्रतिशत तक मतदान हुआ। यदि वहां के मतदाता भी अन्य राज्यों की तरह ही मतदान करते तब औसत आंकड़ा घटकर 60 फीसदी के करीब पहुंच सकता था। इसका चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ेगा ये अलग बात है लेकिन चुनाव आयोग द्वारा किये जाने वाले इंतजाम और राजनीतिक दलों के जोरदार प्रचार के बावजूद यदि देश का लगभग एक तिहाई मतदाता उदासीन है तो इसका संज्ञान लिया जाना जरूरी है। राजनीतिक विशलेषकों के मुताबिक किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में वोटरों की उदासीनता बेहतर लक्षण नहीं है। अगर वोटर लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति उदासीनता दिखाएंगे तो लोकतंत्र की गाड़ी का बेपटरी हो जाने का खतरा हमेशाा सिर पर मंडराता रहेगा।
देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में जहां भाजपा, सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस के बीच जबर्दस्त त्रिकोणीय संघर्ष है और जहाँ से नरेंद्र मोदी, सोनिया गांधी, मायावती, राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे दिग्गज मैदान में हों वहां का औसत मतदान केवल 62 फीसदी के आसपास रहना विचारणीय प्रश्न है क्योंकि ये कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ अर्थात उप्र से होकर ही जाता है। इसी तरह महाराष्ट्र में जहां भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-राकांपा के बीच जोरदार मुकाबला है वहाँ का मतदान प्रतिशत 57 फीसदी रहा जो केवल राजनीति में रूचि रखने वालों के लिए ही नहीं अपितु समाजशास्त्र के अध्ययनकर्ताओं के लिए भी शोध का विषय है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूपी के वोटरों को काफी जागरूक माना जाता है। यहां के वोटरों की राजनीति में सहभागिता एवं सक्रियता किसी से छिपी नहीं है।
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मात्र 31 फीसदी मतों के साथ जब 282 लोकसभा सीटें मिल गईं तब विपक्ष सहित राजनीतिक टिप्पणीकार लगातार ये मुद्दा उठाते रहे कि एक तिहाई जनसमर्थन के बल पर प्रधानमन्त्री बने नरेंद्र मोदी ये दावा करते फिरते हैं कि जनादेश उनके पास है। वैसे बात गलत नहीं है लेकिन आजादी के बाद से शायद ही कभी ऐसा हुआ होगा जब केंद्र की सत्ता में रही पार्टी के पास 50 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं का समर्थन रहा हो। भारतीय लोकतंत्र जिस वयस्क मताधिकार पर आधारित है उसमें मत देना ऐच्छिक है। बीते कुछ समय से नोटा नामक जो व्यवस्था की गई उससे उन लोगों का भी पता चल जाता है जो चुनाव लड़ रहे किसी भी प्रत्याशी को पसंद नहीं करते हुए तटस्थ रहना पसंद करते हैं। राजनीतिक दल हालांकि अधिकाधिक मतदान के लिए हरसम्भव प्रयास करते हैं। बावजूद इसके वोट प्रतिशत का गिरता प्रतिशत बड़ी चिंता का विषय है। समय रहते इस गिरते वोट प्रतिशत पर शोध, चिंतन-मनन की जरूरत है।
विश्वभर में सोशल मीडिया पर जितनी सामग्री परोसी जाती है उसमें भी बड़ा हिस्सा सियासत का पाया जाता है लेकिन ये सक्रियता और जागरूकता मतदान के दिन कहाँ चली जाती है , ये शोध का विषय होना चाहिए। राजनीतिक दलों की सारी कवायद चूंकि सत्ता प्राप्ति के लिए होती है इसलिए वे एक चुनाव संपन्न होते ही आगे के चुनाव में जुट जाते हैं लेकिन उनको इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि मतदाताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मतदान करने के प्रति उदासीन बना रहता है। शायद इसका सबसे बड़ा कारण उन वायदों का पूरा नहीं हो पाना है जो घोषणापत्र रूपी चाशनी में लपेटकर बांटे जाते हैं। सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात ये है कि आम मतदाता के मन में केवल सत्ताधारियों के प्रति ही नहीं वरन विपक्ष के प्रति भी वितृष्णा और अविश्वास का भाव गहराई तक बैठ चुका है।
हर चुनाव में नया मतदाता तो उत्साह के साथ मतदान करता है किन्तु पहले वाले निराश होकर घर बैठ जाते हैं। जिन राज्यों या सीटों पर 75 और 80 फीसदी मतदान हुआ वहां के मतदाताओं की जागरूकता का चुनाव आयोग को प्रचार करना चाहिए। लोकतंत्र जनता के द्वारा संचालित तंत्र है। ऐसे में नेतृत्व की चयन प्रक्रिया में चयनकर्ता की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है। देखने में आया है कि मतदान के दिन घर में बैठकर टीवी देखने वाले कथित बुद्धिजीवी ही चुनाव के बाद व्यवस्था नहीं सुधरने को लेकर सबसे ज्यादा मुंह चलाते हैं। पुरानी कहावत थी जैसा राजा तैसी प्रजा। लेकिन आज के जमाने में जैसी प्रजा तैसा राजा होता है। इसलिए राजा या नेता चुनने वाले ही यदि उदासीन हैं तब सत्ता कैसी होगी ये आसानी से समझा जा सकता है। घटते वोट प्रतिशत के पीछे राजनीतिक दलों का रवैया भी कम जिम्मेदार नहीं है। राजनीतिक उठापटक और अस्थिरता का एक लंबा दौर हमारे देश में रहा है। राजनीति में भ्रष्टाचार के घालमेल के चलते आम आदमी का राजनीति से मोहभंग हो गया। आम आदमी के राजनीति के प्रति बेरूखी के चलते लोकतंत्र के महापर्व के प्रति लगाव भी कम हुआ। शहरी क्षेत्रों में ये उदासी व्यापक तौर पर देखने को मिलती है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो आज भी लोकतंत्र के पर्व में सहभागिता देखने को मिलती है। शहरी क्षेत्रों में पिछले काफी समय जो मत प्रतिशत रिकार्ड किया जा रहा है, वो कम ही है।
लोकतंत्र के महापर्व में मतदाताओं की सहभागिता के लिये चुनाव आयोग की ओर से भी जागरूकता अभियान के अंतर्गत तरह-तरह के आयोजनों पर पैसा फूंका जाता है। लेकिन उसके बाद भी एक तिहाई और कहीं-कहीं तो उससे भी ज्यादा मतदाता यदि अपने और देश के भविष्य के प्रति इतने उदासीन रहते हों तब इसे अच्छा लक्षण नहीं माना जा सकता। बीते। 70 सालों में हमारे देश के सामाजिक जीवन पर राजनीति की छाया इतनी व्यापक और घनी हो चुकी है कि गांव में बैठे अनपढ़ से लेकर अभिजात्यवर्गीय क्लब और अन्य उच्चवर्गीय जमावड़ों में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर अधिकाँश समय राजनीति ही चर्चा का विषय रहती है। नागरिकों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में सहभागिता के बिना न तो उनका भला होगा और न ही लोकतंत्र का भला होगा। नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी समझते हुये लोकतंत्र के महापर्व में अपनी सहभागिता को बढ़ाना होगा। असल में जब लोकतंत्र में नागरिकों की सहभागिता बढ़ेगी तभी एक स्वस्थ, संुदर एवं सुदृढ़ लोकतंत्र की स्थापना कर सकेंगे।

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