ऐसे साफ नहीं होंगी नदियां

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गंगा की सफाई को लेकर एक आरटीआइ दायर की गई थी। इस पर सरकार ने कहा था कि उसे पता ही नहीं, गंगा अब तक कितनी साफ हुई है। आरटीआइ से खुलासा हुआ था कि सरकार के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं हैं जिससे गंगा की सफाई का पता चल सके। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारा सरकारी तंत्र अपनी परियोजनाओं की निगरानी कैसे करता है।

दोपहर विशेष
नदियों को बचाने और प्रदूषण मुक्त बनाने की योजनाओं का हासिल सवालों के घेरे में है। समय और भारी रकम खर्च किए जाने के बाद भी इस दिशा में रत्तीभर भी प्रगति नहीं हो पाई है। इसी का नतीजा है हिमालय से लेकर समुद्र में मिलने तक की यात्रा में गंगा साफ नहीं हो पाई है। गंगा ही नहीं, ज्यादातर नदियों की हालत यही है। गंगा नदी का प्रदूषण कम करने के लिए तीन दशक पहले केंद्र सरकार ने गंगा कार्य योजना (जीएपी) शुरू की थी। लेकिन पंद्रह साल साल तक लगभग एक हजार करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी नदी में प्रदूषण का स्तर कम नहीं हुआ। इसलिए 31 मार्च 2000 को इस कार्ययोजना कोबंद घोषित कर दिया गया। राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण की परिचालन समिति ने गंगा सफाई में प्रगति की समीक्षा में पाया था कि दस लाख लीटर मल-जल को गंगा में प्रवाहित किए जाने से रोकने या उसका उपचार करने का काम किया गया है। इन पंद्रह वर्षों में नदी किनारे के शहरों का मल-जल नदी में डालना इतना बढ़ गया कि प्रदूषण कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। इस तरह, मोटे तौर पर एक हजार करोड़ रुपए और पंद्रह साल खर्च करने के बाद भी गंगा सफाई की दिशा में जो हासिल हुआ है, वह शून्य ही रहा।
इस बीच अप्रैल 1993 में तीन और नदियों- यमुना, गोमती और दामोदर नदी के साथ ‘गंगा एक्शन प्लान-टू’ शुरू किया गया, लेकिन प्रभावी रूप यह 1995 में ले पाया। दिसंबर 1996 में इस योजना का राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में विलय कर दिया गया। फरवरी 2009 में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (एनआरजीबीए) का गठन किया गया। इसमें गंगा के साथ यमुना, गोमती, दामोदर व महानंदा को भी शामिल किया गया। 2011 में इस कार्य के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन का गठन एक पंजीकृत सोसायटी के रूप में किया गया। 1995 से 2014 तक की गंगा सफाई की इन योजनाओं पर चार हजार एक सौ अड़सठ करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। इसमें छोटी-बड़ी नौ सौ सत्ताईस योजनाओं पर काम करते हुए प्रतिदिन 2618 मिलियन लीटर (एमएलडी) पानी साफ करने की क्षमता हासिल की गई। इनके तहत कुछ परियोजनाएं अभी भी चल रही हैं। केंद्र ने 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया। पूरे डेढ़ दशक तक योजनाएं नए-नए रूप लेती रहीं, लेकिन गंगा की हालत नहीं सुधरी।
गंगा नदी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व तो है ही, कई दूसरे कारणों से भी इसका प्रदूषण मुक्त होना जरूरी है। पर हालत यह है कि इसमें रासायनिक कचरे से लेकर गंदे नालों का पानी और जानवरों के साथ मनुष्यों की लाशें और अवशेष आज भी प्रवाहित किए जा रहे हैं। कई बार जांच में सामने आया है कि पानी नहाने या पीने लायक नहीं है। यह अलग बात है कि मजबूरी में अभी भी इसमें हजारों लोग नहाते हैं और इससे भी नदी का प्रदूषण बढ़ता है। लोगों के स्वास्थ्य को खतरा पैदा होता है सो अलग।
प्रधानमंत्री ने 2014 में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा था, ‘अगर हम इसे साफ करने में सक्षम हो गए तो यह देश की चालीस फीसद आबादी के लिए एक बड़ी मदद साबित होगी। अत: गंगा की सफाई एक आर्थिक एजेंडा भी है।’ उल्लेखनीय है कि गंगा नदी का न सिर्फ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व है, बल्कि देश की चालीस फीसद आबादी गंगा नदी पर निर्भर है। इसलिए केंद्र सरकार ने ‘नमामि गंगे’ नाम से एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन की शुरुआत की। नदी की सफाई के लिए बजट को चार गुना करते हुए पर 2019-2020 तक गंगा की सफाई पर बीस हजार करोड़ रुपए खर्च करने की योजना को मंजूरी दी और इसे सौ फीसद केंद्रीय हिस्सेदारी वाली योजना का रूप दिया गया। इसमें दो राय नहीं कि गंगा संरक्षण की चुनौती बहुत बड़े क्षेत्र में तो है ही, कई तरह की भी है।
गंगा की सफाई का काम या इसकी योजना कितनी विशाल है, इसे समझने के लिए यह जानना होगा कि भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण गंगा नदी उत्तराखंड में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी तक विशाल भू-भाग को सींचती है। भारत और बांग्लादेश मिला कर यह ढाई हजार किलोमीटर की दूरी तय करती है। सहायक नदियों के साथ यह दस लाख वर्ग किलोमीटर के विशाल उपजाऊ क्षेत्र से गुजरती है और इसे इसकी घनी आबादी के कारण भी जाना जाता है। ऐसे में गंगा की सफाई का काम बड़ी चुनौती है।
गंगा की सफाई में सबसे बड़ी अड़चन हर तरफ से आने वाला अवशिष्ट, रासायनिक अवशिष्ट और कचरा आदि है। गंगा और सहायक नदियों के किनारे बसे शहरों का ज्यादातर कचरा और औद्योगिक कचरे से लेकर बूचड़खानों तक का कचरा भी इसी नदी में गिराया जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 1984 में एक सर्वेक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट में गंगा के प्रदूषण पर चिंता जताई थी। इसके आधार पर ही पहला गंगा एक्शन प्लान अस्तित्व में आया था। लेकिन तीन दशक में चालीस अरब रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए जाने के बाद भी कार्ययोजना पर अमल उम्मीदों के मुताबिक नहीं हुआ।
केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री ने पिछले साल जुलाई में एक इंटरव्यू में बताया था कि ‘मंत्रालय ने गंगा की ढाई सौ परियोजनाएं चिह्नित की हैं। इनमें से सैंतालीस पूरी हो गई हैं। नमामि गंगे मतलब सिर्फ गंगा नहीं है, इसमें यमुना सहित चालीस नदियां और नाले भी शामिल हैं। यमुना में ही चौंतीस परियोजनाएं चल रही हैं जिनमें बारह दिल्ली में हैं, क्योंकि ज्यादा प्रदूषण यहीं से होता है। कानपुर में सात परियोजनाएं चल रही हैं। इलाहाबाद में पांच में से तीन परियोजनाओं पर काम शुरू हो गया है। वाराणसी में चार में से दो काम शुरू हो गया है। इसी तरह पटना, झारखंड और पश्चिम बंगाल में परियोजनाओं पर काम चल रहा है। लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना है।
दस जुलाई 2014 को सरकार के पहले बजट में अगले छह साल में गंगा जलमार्ग का विकास करने की बात कही गई थी। इसके लिए बयालीस अरब रुपए का प्रस्ताव किया गया था। इसके अलावा पांच साल के लिए एकमुश्त बीस अरब सैंतीस करोड़ रुपए के आवंटन के साथ नमामि गंगे मिशन शुरू किया गया। तब दावा किया गया था कि गंगा 2018 तक साफ हो जाएगी। फिर इस समय सीमा को मार्च, 2019 तक बढ़ाया। तब कहा गया कि मार्च 2019 तक अस्सी फीसद गंगा साफ हो जाएगी। लेकिन अब यह समय सीमा 2020 तक बढ़ा दी गई है।
गंगा की सफाई के लिए सरकार के प्रयासों का मूल्यांकन करने वाली संसदीय समिति ने एक रिपोर्ट में कहा है कि गंगा सफाई के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम पर्याप्त नहीं हैं। राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) भी गंगा की सफाई को लेकर सरकार को एक नहीं, कई बार फटकार चुका है। गंगा की सफाई को लेकर एक आरटीआइ दायर की गई थी। इस पर सरकार ने कहा था कि उसे पता ही नहीं, गंगा अब तक कितनी साफ हुई है। आरटीआइ से खुलासा हुआ था कि सरकार के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं हैं जिससे गंगा की सफाई का पता चल सके। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारा सरकारी तंत्र अपनी परियोजनाओं की निगरानी कैसे करता है। गंगा की सफाई को लेकर जहां एक ओर सरकारी स्तर पर प्रयासों को तेज करने की जरूरत है, वहीं आमजन को भी जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए अभियान चलाना होगा ताकि नदियों को कचराघर बनाने से रोका जा सके।

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