पूनम का चाँद चमकेगा या अमावस रहेगा

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सिन्हा ने कहा कि बीजेपी अब ‘वन मैन शो, टू-मैन आर्मी’ बनकर रह गई है. पार्टी में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण शौरी जैसे वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर दिया गया. मार्गदर्शक मंडल बनाया गया, जिसकी कोई बैठक तक नहीं हुई. शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि अगर सच कहना बगावत है तो मैं बागी हूं ,बोले- भारी मन से पार्टी छोड़ी.शत्रुघ्न सिन्हा ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ने अपने वादे पूरे नहीं किये. बगैर किसी सलाह-मशविरा के नोटबंदी जैसा बड़ा फैसला लिया गया. जिसकी वजह से हजारों लोग बर्बाद हो गए. उन्होंने नोटबंदी को सबसे बड़ा घोटाला करार दिया. सिन्हा ने कहा कि बीजेपी में लोगों की कोई कद्र नहीं है. मैंने किसानों और युवाओं की बात की, लेकिन इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. डॉ. मनमोहन सिंह जैसे वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों की बात को तवज्जो नहीं दिया गया.

चुनाव का बुखार जोरो से चढ़ा है पार्टियों पर । रोज नए नए उम्मीदवार घोषित किये जा रहे है और हम देख रहे हैं की ऐसी सेलिब्रिटी जो काफी दिन दे अँधेरे में थे अब चुनावी मैदान में तलवार भांजने कूद पड़े हैं ।हमारे बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा जी भी अपने डूबे हुए सितारों को चमकाने पूनम का चाँद ले आये हैं ।जी हाँ खुद तो उन्होंने कांग्रेस का दामन थम लिया और पत्नी को ले आये हैं सपा की तरफ से .चुनावी युद्ध में ।लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी के बागी नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने कांग्रेस का ‘हाथ’ थाम लिया है. पटना साहिब से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा दिल्ली में कांग्रेस में शामिल हुए. इस दौरान उनका दर्द भी छलक पड़ा. शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि पार्टी में मेरी बात नहीं सुनी गई. यहां तक कि वरिष्ठ नेताओं को भी दरकिनार कर दिया गया. सिन्हा ने कहा कि बीजेपी अब ‘वन मैन शो, टू-मैन आर्मी’ बनकर रह गई है. पार्टी में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण शौरी जैसे वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर दिया गया. मार्गदर्शक मंडल बनाया गया, जिसकी कोई बैठक तक नहीं हुई. शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि अगर सच कहना बगावत है तो मैं बागी हूं ,बोले- भारी मन से पार्टी छोड़ी.शत्रुघ्न सिन्हा ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ने अपने वादे पूरे नहीं किये. बगैर किसी सलाह-मशविरा के नोटबंदी जैसा बड़ा फैसला लिया गया. जिसकी वजह से हजारों लोग बर्बाद हो गए. उन्होंने नोटबंदी को सबसे बड़ा घोटाला करार दिया. सिन्हा ने कहा कि बीजेपी में लोगों की कोई कद्र नहीं है. मैंने किसानों और युवाओं की बात की, लेकिन इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. डॉ. मनमोहन सिंह जैसे वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों की बात को तवज्जो नहीं दिया गया. विरोधियों को दुश्मन समझा गया. इस दौरान उन्होंने आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की भी तारीफ की और कहा कि उनकी सलाह पर ही कांग्रेस ज्वाइन किया. इधर कांग्रेस का गुणगान करते करते उन्होंने अपनी पत्नी पूनम सिन्हा को सपा में शामिल कर लखनऊ से टिकट भी दिला दिया और किसके साथ पूनम चुनाव लड़ रही है वे है श्री राजनाथ सिंह ,भाजपा का एक बहुत बड़ा नाम .दिलचस्प बात ये है कि सिन्हा ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता तुरंत ही हासिल की है और अब वह लखनऊ में अपने लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही हैं.ऐसे में सवाल उठता है कि इस त्रिकोणीय मुक़ाबले में लखनऊ की जनता किसे चुनेगी?लखनऊ एक ऐसी लोकसभा सीट है जिसे भाजपा का गढ़ माना जाता है.साल 1991 से अटल बिहारी वाजपेयी की धमाकेदार जीत के बाद से बीते लोकसभा चुनाव में राजनाथ सिंह की शानदार जीत तक ये सीट बीजेपी के ख़ाते में ही रही है.पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस सीट से पांच बार सांसद बने. इसके बाद 2009 के चुनाव में लखनऊ की जनता ने लाल जी टंडन चुनकर संसद में भेजा.पिछले लोकसभा चुनाव में भी राजनाथ सिंह ने कांग्रेस की उम्मीदवार रीता बहुगुणा जोशी को दो लाख 72 हज़ार मतों से हराया था.लेकिन समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में कहा था कि सपा-बसपा गठबंधन लखनऊ में एक मजबूत उम्मीदवार उतारेगा.ऐसे में सवाल उठता कि क्या पूनम सिन्हा लखनऊ की जनता का दिल जीतकर राजनाथ सिंह को टक्कर दे पाएंगी.जोधा अकबर जैसी फ़िल्म में काम कर चुकीं पूनम सिन्हा ने इससे पहले कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है.कुछ एक मौके को छोड़ दिया जाए तो विपक्ष ने यहां से बीजेपी को चुनौती देने के लिए बाहरी या ‘सितारे’ ही चुने हैं। हालांकि, यह सितारे विपक्ष के ‘सितारे’ नहीं बदल पाए। एसपी ने 1996 में लखनऊ में पहला चुनाव लड़ा तो राजबब्बर पर भरोसा किया। 1998 में मुजफ्फर अली ने चुनौती दी लेकिन वह राजबब्बर से भी कमजोर साबित हुए। 1999 में कांग्रेस अटल बिहारी वाजपेयी को चुनौती देने कर्ण सिंह को लेकर आई लेकिन परिणाम अपरिवर्तित रहा। 2004 में निर्दलीय लड़ने आए राम जेठमलानी के कंधे पर कांग्रेस ने अपनी भी उम्मीद रख दी लेकिन जनता ने बुरी तरह से झटक दिया। 2009 इकलौता चुनाव था जब बीजेपी को पसीने छूटे थे। कांग्रेस से अपेक्षाकृत स्थानीय रीता बहुगुणा जोशी से महज 41 हजार वोट से लाल जी टंडन जीत पाए थे। एसपी तब भी स्टार नफीसा अली को लेकर आई थी और उनकी जमानत नहीं बची थी। 2014 में कांग्रेस से रीता ही सम्मानजनक वोट पाने में सफल रहीं, एसपी-बीएसपी नाम भर के रहे। आप फिल्म स्टॉर जावेद जाफरी को लेकर आई लेकिन वह जमानत नहीं बचा पाए। कोर वोटरों की जातीय गणित पर बात करें तो विपक्ष के लिए लखनऊ ‘अभेद्द’ नहीं दिखता। लेकिन, जातीय अंकगणित अक्सर यहां कभी हल नहीं हो पाती। जानकारों की मानें तो यहां करीब पौने पांच लाख मुस्लिम और तीन लाख कायस्थ हैं। दो लाख से अधिक दलित हैं। एसपी-बीएसपी इस बार एक साथ है और उनका संभावित प्रत्याशी कायस्थ। ये गठबंधन के लिए वोट में बदलें तो नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं। लेकिन, कायस्थ आम तौर पर बीजेपी का कोर वोटर है और शिया मुस्लिमों में बीजेपी व खासकर राजनाथ सिंह की अच्छी पैठ उन्हें विपक्ष से दूर करती है।
करीब साढ़े चार लाख ब्राह्मण, एक लाख ठाकुर व तीन लाख से अधिक व्यापारी, सिंधी व पंजाबी भी बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ ही जुड़ते हैं। ऐसे में विपक्ष के लिए राह मुश्किल हो जाती है। मसलन मुस्लिम एसपी का कोर वोटर माना जाता है और पिछली बार अभिषेक मिश्र के तौर पर ब्राह्मण प्रत्याशी भी था उसके बाद भी एसपी को महज 56 हजार वोट मिले थे। इन समीकरणों के हल न होने के चलते अक्सर विपक्ष पर राजनाथ के लिए ‘फ्रेंडली’ फाइट के भी आरोप लगते हैं। मजे की बात ये है की सपा ने जिस पूनम सिन्हा को उम्मीदवार बनाया है उनकी अपने क्षेत्र में अभी तक कोई पहचान ही नहीं बनी है ।सियासत की उलटबांसी का यह दिलचस्प नमूना है। गुरुवार को जिस पार्टी के टिकट पर पूनम सिन्हा पर्चा भरेंगी, मंगलवार से उन्होंने उसके चेहरे पहचाने की मशक्कत शुरू की। पार्टी जॉइन कराने के बाद कन्नौज सांसद डिंपल यादव ने एसपी के नगर पदाधिकारियों को बुलाकर उनका परिचय कराया। इस दौरान पूनम नगर अध्यक्ष फाकिर सिद्दीकी, दीपक रंजन, नवीन धवन, सौरभ सहित दूसरे पदाधिकारियों से जान-पहचान की मशक्कत करती रहीं। सूत्रों की मानें तो आनन-फानन में उम्मीदवारी के चलते पर्चा भरने के लिए जरूरी औपचारिकताएं भी अभी पूरी नहीं हो सकी हैं। अभी बैंक खाता खोलने के लिए नूरा-कुश्ती जारी है। कांग्रेस व एसपी दोनों के ही उम्मीदवारों के पास प्रचार के लिए करीब 17 दिन ही बचे हैं।
तो देखते हैं क्या होता है अभी तक तो पूनम जी सर पर पल्लू लिए पति के पीछे दिखाई पड़ती रहीं हैं अब उनकी पहचान बनाने का वक़्त आया है ।ये देखना है की बिहारी बाबू का ये दांव उनकी राजनितिक किस्मत पर छाया अमावस हटा कर पूनम के चाँद को उदय करता है या नहीं ।

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