राजस्थान में वोट बैंक बनकर रह गये हैं मुस्लिम मतदाता

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रमेश सर्राफ धमोरा
देश में लोकसभा चुनावी प्रक्रिया चल रही है। सभी राजनीतिक दलो के नेता अपनी- अपनी पार्टी के अधिकाधिक उम्मीदवारों को जिताने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। राजस्थान में 29 अप्रेल व 6 मई को दो चरणो में चुनाव होने है। यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस व भाजपा के मध्य ही होगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सभी 25 सीटो पर कब्जा जमाया था। मगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने से भाजपा के लिये पिछला परिणाम दोहराना मुश्किल लग रहा है। लोकसभा चुनाव के टिकट वितरण में सभी दलो ने जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुये ही प्रत्याशियों का चयन किया है।
देश में भाजपा विरोधी सभी दलो की नजर मुस्लिम वोटो पर लगी हुयी है। उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती ने खुले आम एक चुनाव सभा में मुसलमानो से कहा था कि वो अपने वोटो का बंटवारा नहीं होने दे। मुस्लिम वोटर संगठित होकर एक साथ मतदान करे। इसी तरह पंजाब के मंत्री नवजोतसिंह सिद्वू ने भी उत्तर प्रदेश में एक चुनाव सभा में मुसलमानो से एकसाथ होकर भाजपा के खिलाफ वोट देने को कहा था। मायावती द्वारा धर्म के आधार पर वोट मांग कर चुनाव की आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर चुनाव आयोग ने उनपर कार्यवाही करते हुये 48 घंटे तक उनके चुनाव प्रचार करने पर रोक लगा दी है।
राजस्थान में करीबन 10 से 11 प्रतिशत तक मुस्लिम मतदाता है। जिनके वोट लेने को तो सभी राजनीतिक दल तैयार रहते हैं मगर उनको सत्ता में भागीदारी देने के सवाल पर पीछे खिसकने लगते हैं। राजस्थान में लोकसभा चुनाव का इतिहास देखें तो मुसलमान वोट लेकर विभिन्न समुदाय के अनेक सांसद बने है मगर मुस्लिम समुदाय से राजस्थान में मात्र एक व्यक्ति झुंझुनू से कैप्टन अयूब खान लोकसभा चुनाव जीत पाये हैं। कैप्टन अयूब खान झुंझुनू से कांग्रेस पार्टी की टिकट पर 1984 व 1991 में दो बार लोकसभा का चुनाव जीतने में सफल रहें हैं। 1995-1996 के दौरान अयूब खान पीवी नरसिम्हाराव की सरकार में कृषि राज्य मंत्री भी रहे थे। कैप्टन अयूब खान 1984,1989, 1991 व 1996 में चार बार झुंझुनू से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़े थे जिनमें 1984 व 1991 में जीते व 1989 व 1996 में हारे थे।
राजस्थान में कांग्रेस ने कैप्टन अयूब खान के अलावा 1951 में जोधपुर लोकसभा सीट से नूरी मोहम्मद यासीन को टिकट दी थी जो निर्दलिय प्रत्याशी हनुवंत सिंह से एक लाख एक हजार 816 वाटो से हार गये थे। उस चुनाव में नूरी मोहम्मद को 38017 वोट व हनुवंत सिंह को एक लाख 39 हजार 833 वोट मिले थे। 1952 में सांसद हनुवंत सिंह की आकस्मिक मृत्यु होने पर हुये उपचुनाव में निर्दलिय जसवंत राज ने फिर से कांग्रेस के नूरी मोहम्मद यासीन को 38344 वोटो से हरा दिया था। जसवंत राज को 58527 वोट व नूरी मोहम्मद को 20183 वोट मिले थे।
1957 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जयपुर से सादिक अली को मैदान में उतारा था जो निर्दलिय हरीश्चन्द्र शर्मा से 4504 वोटो से हार गये थे। कांग्रेस के सादिक अली को 56766 वोट व निर्दलिय हरिश्चन्द्र शर्मा को 61277 वोट मिले थे। 1957 के बीस साल बाद कांग्रेस ने 1977 में फिर एक बार नये लोकसभा क्षेत्र बने चूरू से बीकानेर के रहने वाले मोहम्मद उस्मान आरिफ को टिकट दिया था। मगर कांग्रेस शासन में लगे आपातकाल के विरोध में चल रही देश व्यापी जनता पार्टी की लहर में वो जनतापार्टी (भारतीय लोकदल) के प्रत्याशी दौलतराम सारण से एक लाख 51 हजार 891 वोटो से हार गये थे। जीतने वाले दौलतराम सारण को 258592 वोट व कांग्रेस के मोहम्मद उस्मान आरिफ को 106701 वोट मिले थे।
कांग्रेस ने 1996 में भरतपुर से चौधरी तैयब हुसैन को टिकट दिया जो भाजपा की महाराणी दिव्या सिंह से 90720 वोटो से हार गये। महाराणी दिव्यासिंह को 209834 वोट व कांग्रेस के तैयब हुसैन को 119114 वोट मिले थे। 1998 में कांग्रेस ने जयपुर से एम सईद खान गुडऐज को प्रत्याशी बनाया मगर वो भाजपा के गिरधारीलाल भार्गव से 138971 वोटो से हार गये। भाजपा के गिरधारीलाल भार्गव को 445608 वोट व कांग्रेस के सईद गुडऐज को 306637 वोट मिले थे। 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री डा.अबरार अहमद को झालावाड़ से मैदान में उतारा जो भाजपा की वसुंधरा राजे से 132405 वोटो से हार गये। भाजपा की वसुंधरा राजे को 409574 वोट व कांग्रेस डा. अबरार अहमद को 257157 वोट मिले थे।
कांग्रेस ने 2004 के लोकसभा चुनाव में अजमेर सीट से हबिबुर्र रहमान को टिकट दिया जो भाजपा के रासासिंह रावत से 127576 वोटो से हार गये। भाजपा के रासासिंह रावत को 314788 वोट व कांग्रेस के हबिबुर्र रहमान को 186812 वोट मिले थे। 2009 में कांग्रेस ने चूरू से रफीक मंडेलिया को टिकट दिया जो भाजपा के रामसिंह कस्वां से 12440 वोटो के बहुत कम अंतर से हार गये थे। भाजपा के रामसिंह कस्वां को 376708 वोट कांग्रेस के रफीक मंडेलिया को 364268 वोट मिले थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर चूरू से रफीक मंडेलिया को प्रत्याशी बनाया है जिनका मुकाबला भाजपा के मौजूदा सांसद राहुल कस्वां से है। राहुल कस्वां के पिता से मंडेलिया 2009 में हार चुके हैं। इस तरह देखे तो कांग्रेस ने 1962,1967,1972, 1980 व 2014 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान में एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दी थी।
राजस्थान में कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव नहीं जीत सकने के कारण अब तक कुल आठ मुस्लिम नेताओं को राज्य सभा में भेजा है। राजस्थान से सबसे पहले राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे बरकतुल्ला खान को 1952 से 1960 तक राज्य सभा में भेजा। सादिक अली को 1958 से 1970 तक, मोहम्मद उस्मान आरिफ को 1970 से 1985 (31 मार्च 1985 उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बनने तक)तक, ऊषी खान को 1976 से 1982 तक, मोहम्मद असरारूल हक को 1980 से 1986 तक, डा.अबरार अहमद को 1988 से 1994 तक व 2002 से 2008 तक, एए खान दुरूमियां को 1998 से 2004 तक, अश्कअली टॉक को 2010 से 2016 तक राज्स सभा सदस्य रहे। भाजपा ने भी राजस्थान से नजमा हुपतुल्ला को 2004 से 2010 तक राज्यसभा में भेजा था।
राजस्थान से मोहम्मद उस्मान आरिफ 1980 से 1984 तक केन्द्र सरकार में हाऊसिंग, कृषि व सार्वजनिक वितरण विभाग के उपमंत्री रहे। डा.अबरार अहमद 1993 से 1994 तक केन्द्र सरकार में वित्त व संसदीय कार्य राज्य मंत्री रहे। कैप्टन अयूब खान 1995 से 1996 ते केन्द्र सरकार में कृषि राज्य मंत्री रह चुके हैं। मोहम्मद उस्मान आरिफ को 1985 में उत्तरप्रदेश का राज्यपाल भी बनाया गया था। मोहम्मद उस्मान आरिफ व डा. अबरार अहमद राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे थे।
उपरोक्त विश्लेषण से पता चलता है कि राजस्थान के मुसलमान कांग्रेस को एकमुश्त वोट देते रहे रहें हैं मगर उसकी तुलना में उनको राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। कांग्रेस मुसलमानो को भाजपा का डर दिखाकर उनके वोट लेती रही है। राजस्थान सरकार में भी मुस्लिम समाज के मात्र एक विधायक को मंत्री बनाया गया है जो उनकी अनुपातिक दृष्टि से बहुत कम है। गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 15 मुस्लिमो को टिकट दी थी जिनमें से 8 जीतने में कामयाब रहे हैं।
कभी राजस्थान में कांग्रेस के दो दर्जन से अधिक मुस्लिम विधायक होते थे मगर अब कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भी मुसलमानो को टिकट देने की संख्या घटा दी है जिस कारण उनका विधानसभा में भी प्रतिनिधित्व कम हो गया है। इस बार के लोकसभा चुनाव में भी राज्य के मुस्लिम मतदाताओ का झुकाव कांग्रेस की तरफ लगता है मगर राजस्थान की 15 लोकसभा सीटो पर असर रखने वाले मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस द्वारा मात्र एक टिकट देना उनके साथ मात्र खानापूर्ति बनकर रह गया है। 

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