लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है मीडिया की चिंता

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अशोक मलिक
लोकसभा चुनावों के लिए मतदान शुरु हो चुका है। लोकतंत्र का यह कुंभ आने वाले पांच वर्षों और भविष्य के लिए देश का एजेंडा तय करने का समय है। आज के दौर में मीडिया की भूमिका जिस तेज़ी से बदल और बढ़ रही है मीडिया का स्वरुप उससे भी तेज़ी से बदल रहा है। बदलाव के इस दौर में मीडिया से संबंधित मुद्दों पर तत्काल राष्ट्र की नीतियां निर्धारित करने की आवश्यकता है। देश के चिंतनशील समाज और सभी राजनीतिक दलों और राजनीतिक नेताओं को तत्काल इन मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है। राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों से चुनाव के दौर में ऐसे सभी मुद्दों की चर्चा की अपेक्षा स्वाभाविक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रेस की स्वतंत्रता को बहुत महत्त्व देती है। समाज और राष्ट्र में समाचार माध्यमों की भूमिका के अध्ययन और इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के लिए नीतियों की आधारभूमि के निर्धारण के लिए पहला प्रेस आयोग 1952 में स्थापित किया गया और इसकी 1954 में प्रस्तुत रिपोर्ट में शामिल सिफारिशों के आधार पर वर्किंग जर्नलिस्ट कानून बनाया गया, भारतीय प्रेस परिषद तथा कई संस्थानों की स्थापना की गई। आयोग की अनेक महत्त्वपूर्ण सिफारिशों के आधार पर पत्रकारिता के व्यवसाय को व्यवस्थित करने में मदद मिली। प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा और प्रेस को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में मदद करने की व्यवस्था की गई। प्रेस आयोग की स्थापना देश की आज़ादी के बाद लोकतंत्र के इस चौथे पाये के विकास, प्रेस की आज़ादी के महत्व और इसके जिम्मेदारीपूर्ण संचालन की आवश्यकता को लेकर हमारी सरकार की सजगता के सबूत के रूप में देखी जाएगी। भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के विकास ने लोकतंत्र के विकास में बहुत बड़ी भूमिका रही है। आपातकाल के दौरान प्रेस को खामोश करने के सरकार के प्रयास का दुष्परिणाम देखते हुए प्रेस की स्वतंत्रता को और मजबूत करने के लिए देश में रेडियो और टेलीविज़न के विस्तार के दौर से पहले दूसरे प्रेस आयोग का गठन 1978 में किया गया। सरकार बदलने के बाद 1980 में प्रेस आयोग का पुनर्गठन किया गया और 1982 में इसमें अपनी रिपोर्ट सौंपी। पिछले 36 वर्ष में देश का मीडिया परिदृश्य बहुत बदल गया है। आज रेडियो और टीवी पर सरकार के एकाधिकार की स्थिति समाप्त हो चुकी है, एक बहुत बड़े ऑनलाइन मीडिया और एक बहुत जीवंत सोशल मीडिया के चलते मीडिया की भूमिका तेज़ी से बढ़ी और बदली है। प्रधानमंत्री ने हाल ही में सोशल मीडिया को लोकतांत्रिक मीडिया का नाम दिया है क्योंकि इसकी पहुंच बहुत व्यापक है। चुनाव के दौर में मीडिया की भूमिका इस बार भी बड़ी बहस का मुद्दा बनी हुई है, इसका स्वस्थ विकास और जिम्मेदारी पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने पर निकट भविष्य में गंभीर विचार पर सहमति बनाना आजकी तात्कालिक आवश्यकता है। भारतीय प्रेस परिषद देश में जिम्मेदार पत्रकारिता के निर्बाध संचालन की व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। रेडियो, टेलीविज़न, ऑनलाइन तथा सोशल मीडिया के अव्यवस्थित ढंग से संचालन को लेकर समय समय पर अनेक मंचों से चिंता व्यक्त की गई है। लेकिन प्रेस परिषद को नई टेक्नालोजी से जन्मे इन नए संचार माध्यमों के कामकाज में व्यवधान डालने की कोशिशों या इनके गैर जिम्मेदारीपूर्ण इस्तेमाल को लेकर आने वाली शिकायतों के मामले सुनने का अधिकार नहीं होने के कारण देश और समाज में गंभीर समस्याएं बार-बार सामने आ रही हैं। पत्रकार जगत और जागरूक समाज के अनेक मंचों से प्रेस परिषद का रूप बदल इसे मीडिया परिषद बनाने और मीडिया के नए मंचों के स्वतंत्र तथा जिम्मेदार इस्तेमाल की व्यवस्था सुनिश्चित करने की जरूरत की बात बार-बार कही गई है। प्रेस परिषद के पांच दशक से अधिक समय के अनुभव के दृष्टिगत परिषद के गठन की प्रक्रिया और इसके अधिकारों पर पुनर्विचार की आवश्यकता भी स्पष्ट है।
पत्रकारों पर हमलों और उन्हें धमकियों के चलते प्रेस और अन्य समाचार माध्यमों के कर्मियों के लिए समुचित व्यवस्था की जरूरत की तरफ समय-समय पर ध्यान दिलाया जाता रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार ने बहुत वर्ष पूर्व इसके लिए शासनादेश द्वारा एक विशेष व्यवस्था बनाई थी, महाराष्ट्र विधान सभा द्वारा पारित पत्रकार सुरक्षा कानून राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लंबित है। बिहार में चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए एक कानून बनाया गया है, राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की विशेष व्यवस्था स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के माध्यम से देश और समाज को मजबूत बना सकती है। पत्रकारों पर हमलों के मामलों की फ़ास्ट-ट्रैक पड़ताल और पत्रकारों के लिए सुरक्षा प्रशिक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ संस्थाएं कार्यरत हैं।
भारत में देश की आंख-कान का काम करने वाले पत्रकारों पर हमलों की संख्या और हमलों में कलम के सिपाहियों के हताहत होने की घटनाओं के दृष्टिगत उन्हें ऐसा प्रशिक्षण देने की व्यवस्था और धमकी या हमले की स्थिति में उनकी सहायता के लिए पत्रकार हेल्पलाइन की व्यवस्था के लिए राष्ट्रीय सहमति भी इस दौर में हो जाए यह अच्छा होगा। समाचार पत्र, समाचार चैनलों, ऑनलाइन समाचार पोर्टलों और नए लोकतांत्रिक समाचार मंच के रूप में उभर रहे सोशल मीडिया से जुड़े सभी मुद्दों पर विचार करने और इनके समाधान के लिए राजनीतिक संकल्प के लिए सही समय आज है।
इस समय इन मुद्दों की चर्चा का उद्देश्य यह होना चाहिए कि सरकार जो भी बने मीडिया को लेकर देश और समाज के सरोकारों पर राष्ट्रीय सहमति हो। स्वस्थ समाज में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सुरक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मीडिया पेशेवर महत्वपूर्ण हैं। 60 वर्ष की आयु पार कर चुके पत्रकारों के लिए सामाजिक और वित्तीय सुरक्षा और यह सुनिश्चित करने की व्यवस्था चाहिए कि पत्रकार तथा गैर-पत्रकार समाचार पत्र कर्मियों के लिए वेज बोर्ड कार्यान्वयन से संबंधित सभी मामलों को फास्ट ट्रैक पर रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है।

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