मुद्दों की बजाय जातिवाद की जंजीरों में उलझा चुनाव

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राजेश माहेश्वरी
लोकसभा चुनाव पूरे उफान पर है। सत्ता हासिल करने के लिये राजनीतिक दल एक-दूसरे को पछाड़ने का हर हथकंडा अपना रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच असल मुद्दे गायब हैं और पूरा चुनाव जातिवाद की जंजीरों में उलझा दिखाई दे रहा है। चुनाव पूर्व जितने भी सर्वेक्षण सामने आए उनमें जीत-हार का आधार जाति और धर्म को ही माना गया। राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दे भी हालांकि मायने रखते हैं लेकिन ज्यादातर लोगों के सिर पर जाति और धर्म का नशा चढ़ा हुआ है। मुस्लिम मतदाताओं के बारे में सभी सर्वेक्षणों में स्थायी रूप से ये मान लिया गया कि वे भाजपा को हराने वाले उम्मीदवार का साथ देंगे। इसी तरह कुछ जातियों के बारे में भी सर्वे एजेंसियों ने ये अनुमान लगा लिया कि उनका एकमुशत वोट अमुक पार्टी को ही मिलेगा। चुनाव विश्लेषण के लिहाज से ये उपयोगी हो सकता है लेकिन लोकतंत्र के भविष्य और सेहत के हिसाब से बहुत ही खराब संकेत है। कुल मिलाकर हर चुनाव की तरह इस बार भी मुद्दे गायब होते जा रहे हैं और जातिवाद तथा संप्रदायवाद हावी होता जा रहा है। देखा जाए तो लोकसभा चुनाव में मुद्दों की कोई कमी नहीं है, लेकिन असल मुद्दों के बजाय ऐसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं, जिन मुद्दों का जनता से कोई सरोकार ही नहीं है। चोर-सिपाही का खेल, व्यक्तिगत-पारिवारिक उठापटक, गड़े मुर्दे खोदना, अपनी असफलता का ठीकरा दूसरों पर फोड़ कर जनता का वक्त जाया करना दुर्भाग्य की बात है।
बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं, जनसंख्या वृद्धि, अर्थव्यवस्था से संबंधित मुद्दों, बैंकिंग, औद्योगिक विकास, देश की सार्वजनिक संस्थाओं की खस्ताहालत आदि मुद्दों पर चुप्पी बनाए रखना, क्या जिम्मेदार प्रशासन की निशानी है? वादे तो इस बार भी बहुत किए गए हैं, परंतु भूले-बिसरे वादों की लंबी कतारें जनता को आईना दिखाकर फिर से प्रशासन पर विश्वास न करने का संकेत दे रही हैं। प्रत्येक चुनाव में क्षेत्रीय दल हो या राष्ट्रीय दल जातिवाद न करने की बात कहते हुए टिकट बंटवारे में जातीय समीकरण का ध्यान जरूर रखते हैं. इतिहास गवाह है कि देश के वोटर्स का बड़ा वर्ग भी जातिवाद के डोरे में उलझकर कई बार वोटिंग कर देता है। भारत जैसे जाति आधारित समाज में राजनीति उससे मुक्त रहे ये असम्भव है लेकिन आजादी के पहले जातिगत आधार पर समाज को विभाजित करने वाली प्रथाएं मिटाने के लिए अनेक आंदोलन हुए। गाुधीजी ने तो अछूतोद्धार को अपनी लड़ाई का हिस्सा बनाया था किन्तु उनके समानांतर अनेक समाज सुधारकों ने भी जाति के नाम पर होने वाले भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किये। आजादी के बाद गांधीजी ज्यादा समय तक रहे नहीं और डॉ. आंबेडकर भी जल्द ही केंद्र सरकार से अलग हो गए। समाजवादी आंदोलन के नाम पर जाति मिटाने के प्रयास भी हुए लेकिन डॉ. लोहिया के अनुयायी आज के समय के सबसे बड़े जातिवादी बनकर उभरे जिन्होंने पूरे राजनीतिक विमर्श को जाति के जाल में जकड़ दिया।
भारत में ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व में जाति प्रथा किसी न किसी रूप में विद्यमान अवश्य होती है। यह एक हिन्दू समाज की विशेषता है जोकि गम्भीर सामाजिक कुरीति है। जाति प्रथा अत्यन्त प्राचीन संस्था है। वैदिक काल में भी वर्ग-विभाजन मौजूद था, जिसे वर्ण-व्यवस्था कहा जाता था, यह जातिगत न होकर गुण व कर्म पर आधारित थी। भारतीय राजनीति की मुख्य विशेषता है- परम्परावादी भारतीय समाज में आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना। स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय राजनीति का आधुनिक स्वरूप विकसित हुआ। अतरू यह सम्भावना व्यक्त की जाने लगी कि देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था स्थापित होने पर भारत से जातिवाद समाप्त हो जाएगा किन्तु ऐसा नहीं हुआ अपितु जातिवाद न केवल समाज में ही वरन् राजनीति में भी प्रवेश कर उग्र रूप धारण करता आ रहा है।
भारत के राजनैतिक इतिहास के पन्ने पलटे तो यह बात साफ हो जाती है कि देश में हुए पहले आम चुनाव से ही जातिवादी राजनीति चलने लगी थी फिर भी क्षेत्रीय दलों के उभार ने इसे और मजबूत किया। कुछ क्षेत्रीय दल तो सिर्फ और सिर्फ जाति के आधार पर ही खड़े हैं। सन् 80 के बाद कुछ राज्य में जातीय आधारित क्षेत्रीय दल हावी हुए तो राष्ट्रीय पार्टी कमजोर होने लगी। पहले कांगे्रस के पैर उखड़े। उत्तर प्रदेश और बिहार में देश की सबसे पुरानी पार्टी का अस्तित्व ही दांव पर लग गया। भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता आज चरम पर है। इसके बाद भी इसे सम्पूर्ण राष्ट्रीय पार्टी नहीं कहा जा सकता। भाजपा आज कई राज्य की सत्ता पर सवार है। उसे भी जातिवादी छोटे-छोटे दल से हाथ मिलाना पड़ रहा है।
जब भी हमारे देश मे चुनाव आते है, जातिवाद हावी हो जाता है। प्रत्याशियों का चयन भी क्षेत्र की जातिगत बाहुल्यता देखकर किया जाता है। जिस जाति के लोग जिस क्षेत्र में अधिक होते है उसी जाति के नेता को टिकिट आवंटन में वरीयता मिलती है। कुछ एक बड़े नेताओं को छोड़कर ज्यादातर नेता जातिगत आधार पर बने हुए नेता ही होते है। जिस जाति के लोग कम होते है उससे बिरले ही होते है जो नेता बन जाते है। लेकिन सबसे ज्यादा खास बात यह है कि जाति के आधार पर बने हुए यह नेता कभी भी अपने आपको जातिगत सिद्ध नही होने देते है। दिखावा तो यही रहता है कि हम सभी को समान रूप से देखते है। कुछएक नेता अर्जुन मेघवाल जैसे होते है जो अपनी जाति वालो की पैरवी करने के चक्कर मे नप जाते है। यह सच है कि वोट पर जाति का असर पड़ता है। कभी-कभार जाति के आधार पर ध्रुवीकरण इतना तीखा होता है कि जाति के सिवाय और कुछ नहीं लगने लगता है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जाति वोट पर असर डालने वाले कारकों में से एक है, एकमात्र कतई नहीं। आमतौर पर कोई भी एक जाति किसी एक दल या उम्मीदवार के पक्ष में चालीस-पैंतालीस फीसदी से ज्यादा वोट नहीं डालती है। कभी-कभार ही किसी एक जाति के ज्यादातर वोट किसी एक ही पार्टी को मिल जाने का करिश्मा हुआ है। एक खास कारण से चुनाव हमें जातियों का खेल लगने लगा है। पिछले 10-15 साल में उत्तर प्रदेश और बिहार की परिस्थितियों ने हम सब के मन में कहीं न कहीं पूरे देश की छवि बना ली है। यही भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना है। जिस दिन से जाति को न कहना शुरू किया जायेगा, हालात बदलने लगेंगे। इस लोकसभा चुनाव में शुरूआत हो सकती थी। किसी ने भी ईमानदार कोशिश नहीं की। हर हाल में सत्ता चाहिए की जिद जातिवाद की बेडियां तोडने नहीं दी।
किसान तो मुख्य धारा में होना चाहिए। बेरोजगारी की समस्या कैसे दूर होगी यह बताया जाना जरूरी है। अलग-अलग राज्य में अलग-अलग समस्याएं है। कहीं पानी की कमी है तो कहीं बाढ़ बरसात में तबाही मचाती है। स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र तो अभी भी शहर तक सिमटा हुआ है। गांव-देहात मेें अब भी सामान्य बुखार की गोली नहीं मिलती। शिक्षा का मामला भी इससे जुदा नहीं माना जा सकता। हजारों-हजार गांव ऐसे हैं जहां आज भी स्कूल नहीं मिलेगा। पीने के साफ पानी से लेकर शौचालय तक का टोटा है। ताली दोनों हाथ से बजती है। सिर्फ नेताओं और पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया जाना गलत है। पिछड़ापन कहें या जागरुकता की कमी। 21वीं सदी का मतदाता भी जाति देखकर बटन दबाता है। वह धार्मिक हवा के बहाव में बह जाता है। यह नहीं सोचा जाता कि तात्कालिक लाभ फायदेमंद है या दीर्घकालीन योजना। एक दिन का वोट पांच साल का पछतावा। देगी। यह लोकसभा चुनाव इस देश का संपूर्ण भविष्य निश्चित कर सकता है। अतः प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रहित का विचार करना होगा। हालांकि यहां एक बात स्पष्ट है कि जब तक हमारे देश का पढ़ा-लिखा मतदाता जाति से प्रभावित होकर वोट करता रहेगा तब तक भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र होकर भी लोकतंत्र की स्पिरिट को मिस करता रहेगा।

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