ससंद की पंसद बने दागी, बागी और दौलतबादी

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प्रभुनाथ शुक्ल
राजनीति का अपराधीकरण अर्से से विमर्श का मुद्दा रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का यह सबसे बड़ा कलंक है। चारित्रिक राजनीति के लिए यह अशुभ संकेत है। राजनीति में लगातार दागी, बागी, दौलदमंदों के साथ अपराध के आरोपियों की दाताद बढ़ रही है। चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली संस्था एडीआर की रिपोर्ट चैकाने वाली है। यह मसला हमारी संसद की कभी आवाज नहीं बन पाया। सत्ताधारी या प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने वाला दल अपराधियों के लिए दरवाजे खोल रखे हैं। करोड़ों रुपये चुनावी चंदे के रुप में लेकर टिकट बांटे जाते हैं। फिर संसद पहुंचने वाले इस तरह के लोगों से हम लोकतांत्रिक पारदर्शिता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। आज सामान्य आदमी के बस की बात चुनाव लड़ना नहीं रह गया है। गिरी हुई राजनीति में वह इसकी कल्पना तक नहीं कर सकता है।
कहने को तो हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के भागीदार है, लेकिन जमींनी सच्चाई है कि ससंद में पहुंचने वाले अस्सी फीसदी के अधिक लोग करोड़पति है। लोकतंत्र में भागीदारी करने वाला आम आदमी हासिए पर है। आपराधिक पृष्ठभूमि के साथ धनपशु राजनेता बन रहे हैं। राजनीति अब जनसेवा के बजाय व्यापार बन गयी है। राजनेताओं की संपत्तियां पांच साल में कई गुना बढ़ रही हैं। चुनावों में राजनीतिक दल गरीबी मिटाने का वादा करते हैं। लेकिन गरीब जहां का तहां खड़ा है जबकि राजनेताओं की संपत्ति दिन-दूना रात चैगुना बढ़ी है। 17 वीं लोकसभा के लिए देश मतदान करने जा रहा है। अफसोस राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण संसद की कभी आवाज नहीं बन पाया। मतदान करने वाले लोग भी जाति, धर्म, संप्रदाय में बंट गए हैं। मतदाताओं का ध्यान जमींनी समस्याओं भटका दिया जाता है। देश का 60 फीसदी मतदाता नई सोच वाले हैं। क्या वह वोट देने से पूर्व अपने इलाके के नेताओं से सवाल पूछता है। राजनैतिक दलों की तरफ से थोपे गए उम्मीदवार को वह अपनी पसंद क्यों बना लेता है। जिसकी वजह है कि अपराधी प्रवृत्ति के लोग संसद पहुंच जाते हैं। यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी के साथ साथ आम मतदाता की समाजिक जबाबदेही भी बनती है। दागी, बागी और अपराध के आरोपी संसद पहुंच कर कौन सा आदर्श प्रस्तुत करेंगे। हमारा समाज उनसे कौन सी अपेक्षा रखेगा। चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली संस्था एडीआर की रिपोर्ट बेहद गंभीर है। 2014 में संसद पहुंचने वाले 83 फीसदी सांसद करोड़पति हैं।
हर तीसरे सांसद पर आपराधिक मुकदमा दर्ज है जबकि 33 फीसदी माननीय दागी हैं। 543 सांसदों में से एडीआर ने 521 के जो आंकड़े जारी किए हैं वह राजनीति के गिरते स्तर पर सवाल खड़े करते हैं। एडीआर का यह विश्लेषण खयाली पुलाव नहीं है। यह रिपोर्ट माननीयों की तरफ से नामांकन के दौरान दिए गए शपथ पत्र के आधार पर तैयार की गयी है। जरा सोचिए जिस लोकतंत्र में हम पारदर्शिता और सुशासन, समता, समानता का दंभ भरते हैं उसकी असली तस्वीर यह है। भारतीय राजनीति का भविष्य क्या होगा। राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए किसी हद तक गिर सकते हैं।
2014 में संसद की गरिमा बढ़ाने वाले माननियों में 430 करोड़पति हैं। सम्माननियों की औसत संपत्ति तकरीबन 15 करोड़ है। 32 सांसद ऐसे हैं जिनके पास 50 करोड़ की चल अचल संपत्ति है। 543 सांसदों में सिर्फ दो सुदामा है जिनके पास सिर्फ पांच लाख की कुल जमापूंजी हैं। जबकि 33 फीसदी सासंदों यानी 106 के खिलाफ आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं। दस के खिलाफ हत्या के आरोप हैं। जबकि 14 के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है। 14 सांसदों पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप है। राजनीति में पूंजीबाद किस तरह हावी हो रहा है यह अपराधीकरण से भी अधिक चिंता का विषय है। चुनावों के दौरान गरीबी मिटाने के दावे किए जाते हैं।
मंचों से जो लोग 130 करोड़ जनता की आवाज बनने का दावा करते हैं उनकी जमीनी सच्चाई क्या है जरा देखिए। एक रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा अध्यक्ष अमितशाह की संपत्ति सात साल में तीन गुना जबकि उनकी पत्नी की संपत्ति 16 गुना बढ़ गयी। कांगे्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सबसे आगे निकले इनकी संपत्ति दस साल में दसगुणा बढ़ी है। एक रिपोर्ट की तथ्यात्मकता पर भरोसा करें तो कई भारतीय राजनेता ब्रिेटेन की महारानी एलिजाबेथ की संपत्ति को भी मात दे सकते हैं। राजनैतिक लिहाज से उत्तर प्रदेश की विशेष अहमियत है। सियासी गलियारों में एक कहावत है कि दिल्ली का रास्ता यूपी की गलियों से होकर गुजरता है।
यहां 2004 से 2017 के बीच 19971 उम्मीदवार लोकसभा और राज्य विधानसभा के लिए चुनावी मैदान में उतरे। जिनमें 1443 लोग संसद और दारुल सफा यानी लखनउ तक का सफर तय किया। यहां सभी राजनीतिक दलों ने अपराधियों को खुल कर गले लगाया। सत्ता हो या विपक्ष सब ने अपराधियों से बराबर की यारी निभायी। इस दौरान यहां से जो लोग चुनकर गए उसमें सपा ने 42 भाजपा ने 37 बसपा ने 34 कांग्रेस ने 35 फीसदी लोगों को चुनाव मैदान में उतारा जिन पर आपराधिक मुकदमें दर्ज थे या हैं। जबकि 2012 में तकरीबन 45 फीसदी दागी चरित्र वालों को पसंद किया गया। दौलतमंद भी खूब पंसद किए गए। एक आंकड़े के मुताबित विगत 13 सालों में बसपा ने सबसे अधिक 59 फीसदी करोड़पतियों को उम्मीवार के रुप में अपनी पहली पसंद बनाया जबकि दूसरे पर सपा 55 फीसदी रही। अपने को सबसे आदर्शवादी दल कहलाने वाली भाजपा और कांग्रेस किसी से पीछे नहीं दिखते। दोनों राष्टीय दलों की सोच भी इस मामले में बेहद संकुचित है। बीजेपी ने 52 और कांग्रेस ने 42 फीसदी करोड़पतियों को टिकट दिया। अब आप सोचिए हम ऐसे राजनीतिक दलों से लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुचिता और पारदर्शिता की उम्मीद भला कैसे कर सकते हैं।
अब चुनाव वहीं व्यक्ति लड़ सकता है जिसके पास पैसा, ग्लैमर और अपराधिक रसूख है। 2019 के आम चुनाव में भी यही देखने को मिल रहा है। पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता जो डंडे और झंडे के साथ हर स्थिति में संघर्ष करने के लिए तैयार रहते हैं वह हांसिए पर हैं। जबकि फिल्मी सितारों और अपराधियों की पौ बारह है। दो घंटे में दल का दुपट्टा ओढ़ने वालों को टिकट थमा दिया जा रहा है। जरा सोचिए हम कहां जा रहे हैं। हम मतदान क्यों करें।
किसके लिए करें। अपराधी या धनपशु चुनने के हम वोट क्यों डालें। कौन दे सकता है इसका जबाब। चुनाव आयोग इस मसले पर सक्रिय क्यों नहीं दिखता। सजायाफता वाले नियम से लोकतंत्र बचने से रहा। क्योंकि हमारे देश में मुकदमें के फैसले आने में सालों लग जाते हैं तब तक ससंद में अपराधियों की पूरी पीढ़ी पहुंच जाएगी। हम किस तरह के लोकतंत्र का निर्माण कर रहे हैं जहां न नीति है न विचार और न विवेक। ग्लैमर से सत्ता मिल सकती है, लेकिन पारदर्शी लोकतंत्र की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

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