संकट के दौर से गुजर रहा है रियल एस्टेट

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दीनदयाल मुरारका
रोटी, कपड़ा और मकान हमारी बुनियादी जरूरतें हैं। हर किसी का सपना होता है कि उसका अपना एक घर हो। उसके सर के ऊपर एक छत हो। बढ़ती आबादी के साथ ही मकान की जरूरतें भी उसी अनुपात में बढ़ रही हैं . किसी को घर मुहैया कराने का काम रियल एस्टेट यानी कंस्ट्रक्शन क्षेत्र करता है। रियल एस्टेट यानी कंस्ट्रक्शन क्षेत्र कृषि क्षेत्र की तरह अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने वाला भी है .घरेलू अर्थव्यवस्था में रियल एस्टेट की बड़ी भागेदारी है। लेकिन पिछले कई वर्षों से रियल मार्किट में जो गिरावट आई है ,उससे वह अभी तक नहीं उबर है . कई कारणों से रियल एस्टेट की पिछले कुछ वर्षों से कमर टूटी हुई है।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान रियल एस्टेट के घरों की कीमतों में कमी आई। पुणे और मुंबई समेत तमाम महानगरों में गिरावट देखी जा रही है . इस गिरावट का मुख्य कारण डिमांड में आई कमी है . धीमी सेल्स की वजह से नई लॉन्चिंग भी नहीं हो पा रही है। इसका मुख्य कारण खरीदारों का न मिलना है। कंस्ट्रक्शन एक ऐसा क्षेत्र है, जिससे तमाम उद्योग जुड़े हैं। सर्किल रेट और वास्तविक कीमत के अंतर ने जमीन को और महंगा कर दिया है। मंदी के इस दौर में छोटे बिल्डरों की कमर ही टूट गई है। रियल एस्टेट में पूंजी निवेश करने वाले लोग भी किनारा कर गए हैं। हालत यह है कि इस क्षेत्र से जुड़े लोगों ने दूसरा व्यवसाय तलाशना शुरू कर दिया है। नई कालोनियों में प्लाट नहीं बिक रहे हैं। जो प्लाट बिक गए हैं सर्किल रेट की वजह से उनके बैनामे नहीं हो पा रहे हैं। मौजूदा स्थिति का सबसे अधिक असर मध्यम स्तर और इससे निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों पर हुआ है, जो आवासीय परियोजनाओं की बिक्री और विपणन कार्यों से जुड़े हैं . पिछले कुछ सालों के दौरान बिक्री घटने से मुंबई और एनसीआर में नौकरियां कम हुई हैं . पिछले दिनों मुंबई की एक कंपनी ने बड़ी संख्या में कर्मचारी निकाल दिए . इनमें ज्यादातर झुग्गी पुनर्विकास परियोजनाओं में शामिल थे। रियल एस्टेट क्षेत्र में नौकरियां जाने की वास्तविक संख्या के बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन जानकारों का कहना है कि मुंबई और एनसीआर में करीब 80 प्रतिशत डेवलपरों ने कर्मचारी कम किए हैं। डेटा एनालिटिक्स कंपनी प्रॉप इक्विटी के आंकड़ों के अनुसार 2017 के पहले तीन महीनों में आवासीय जायदाद की बिक्री नोएडा, गुडग़ांव, मुंबई और बेंगलूरु में कम होकर आधी रह गई है।
ऐसे हालात में रियल एस्टेट के लिए जब तक सरकार की ओर से ठोस कदम नहीं उठाए जाते ,तब तक इस क्षेत्र में बूम आने की बात बेमानी है . रियल एस्टेट को मंदी से उबारने के लिए अभी और सकारात्मक कदम उठाए जाने की जरूरत है . इसके लिए सिंगल विंडो की नीति अपनानी होगी . कर्ज के लिए लचीली व्यवस्था बनानी होगी .कर्ज को लेकर कंस्ट्रक्शन उद्योग के लिए नई प्रणाली विकसित करनी होगी।
एक तरफ सरकार 2022 तक सबको घर देने का लक्ष्य रख रही है .दावा किया जा रहा है कि ऐसे में रियल एस्टेट देश में रोजगार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र बन जाएगा .दावा किया जा रहा है कि 2030 तक भारत का रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर दुनिया में तीसरे पायदान पर होगा भारतीय अर्थव्यवस्था (जीडीपी) में इसका योगदान 15 फीसद रहने की संभावना का भी दावा किया जा रहा है . रियल एस्टेट में आए संकट को देखते हुए फिलहाल यह दावा बेमानी है . असल सवाल यह है कि सरकार रियल एस्टेट को बूम देने के लिए कितनी चिंतित है ? सरकार की नीतियों में तो कहीं कुछ झलकता नहीं . खाली दावे ही दावे हैं . २०३० तक देश दुनिया में बड़े बदलाव आएंगे ,इस बात से किसी को इंकार नहीं . असल सवाल है कि क्या सरकार रियल एस्टेट को संकट से उबारने के लिए फिलहाल कोई ठोस कदम उठाने की स्थिति में नजर आती है?
वर्ष २०१९ का जो बजट पेश किया गया , वह भी रियल एस्टेट को आगे बढ़ाने ने के लिए बहुत ज्यादा सकारात्मक कदम नहीं उठाए है .रियल एस्टेट डेवलपर्स क्षेत्र के संकट दूर करने के लिए उद्योग का दर्जा दिए जाने की मांग एक अरसे से कर रहे हैं .लेकिन उनकी यह मांग आज भी बनी हुई है। रियल एस्टेट में बैंकिंग सेवाओं को सरल करने की उम्मीदें इस क्षेत्र को थी ,लेकिन इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया। जीएसटी, रेरा आदि की अड़चनें रियल एस्टेट कारोबारियों के लिए चुनौती बनी हुई है। जीएसटी लागू होने से मंदी की रही-सही कसर पूरी हो गई।

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