चाय वाले से चौकीदार तक

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अजय भट्टाचार्य
सत्रहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के एक चरण का मतदान हो चुका है। 2014 के लोकसभा चुनावों और वर्तमान चुनावों के बीच जो मूल परिवर्तन हुआ है वह चाय वाले से चौकीदार तक का परिवर्तन मात्र है। सत्ता प्रतिष्ठान पर प्रतिष्ठित भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में अपने नेतृत्व को चायवाला प्रचारित कर देश के आम जनमानस को सन्देश दिया कि उनके बीच का एक गरीब आदमी सता के शीर्ष पर जब स्थापित होगा तो भारत के सबसे गरीब आदमी का भला होगा। अलबत्ता अभी तक यह यक्षप्रश्न बना हुआ है कि 1973 में बने वडनगर रेलवे स्टेशन पर 23 साल का बालक नरेंद्र अगर चाय बेचता था तो 1968 में जसोदाबेन से शादी करने के बाद 1971 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने के बाद 21 साल की उम्र में घर छोड़ने वाला बालक कौन था।
भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन पूरी ठसक के साथ सत्तासीन हुआ और नरेंद्र मोदी सरकार के मुखिया बने। 26 मई 2014 को संसद की दहलीज को नमन कर संसद भवन में प्रवेश कर मोदीजी ने जब नेता चुने जाने की औपचारिकता पूरी होने के बाद अपने पहले संबोधन में कहा था कि 2019 के चुनाव में मैं अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करूंगा। मोदी सरकार का रिपोर्ट कार्ड चौकीदार के रूप में चुनावी सभाओं की चर्चा का मुख्य केंद्र बन चुका है। चौकीदार के अस्तित्व में आने की भूमिका अथवा कारण सभी को मालूम है।
सरकार बनने के बाद जोर-शोर से देश के कायापलट की मुनादी की गई। इनमें सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाली योजना स्मार्ट सिटी की घोषणा थी। सरकार ने 2015 में इस योजना की शुरुआत की और देश भर में 100 स्मार्ट सिटी बनाने का संकल्प किया और इसके लिए 200 अरब रुपये खर्च करने का बजट प्रावधान रखा। यह आलेख लिखे जाने तक मात्र 35.6 अरब रुपये ही स्मार्ट सिटी बनाने के लिए खर्च किये गए हैं। दिसंबर 2018 तक सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन के 5, 151 योजनाओं को मंज़ूरी दे दी थी जिसका बजट 2,000 बिलियन रुपयों के क़रीब था। जनवरी, 2019 में सरकार की ओर से कहा गया कि इसकी 39% योजनाएं या तो जारी हैं या फिर पूरी हो चुकी हैं. इसके अलावा सरकार ने इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी है। हालांकि आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि स्मार्ट सिटी मिशन के लिए जितना बजट आवंटित हुआ था, असल में ख़र्च उससे बहुत कम हुआ है।
किसान बीमा योजना के माध्यम से सरकार ने किसानों को सुखी बनाने का सपना दिखाया जो खुद एक बहुत बड़े घोटाले की मुख्य स्रोत बन गई। नवंबर 2018 के पहले सप्ताह में कृषि क्षेत्र की समस्याओं और समाधान पर आधारित एक सम्मेलन में ख्यात पत्रकार व खेती के क्षेत्र में काम कर रहे पी. साईंनाथ ने एक उदाहरण के जरिये खुलासा किया कि महाराष्ट्र में 2.80 लाख किसानों ने अपने खेतों में सोया उगाया था। एक ज़िले के किसानों ने 19.2 करोड़ रुपये का प्रीमियम अदा किया। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकार की ओर से 77-77 करोड़ रुपये यानी कुल 173 करोड़ रुपये बीमा के लिए रिलायंस इंश्योरेंस को दिए गए। किसानों की पूरी फसल बर्बाद हो गई और बीमा कंपनी ने किसानों को पैसे का भुगतान किया।
एक ज़िले में रिलायंस ने 30 करोड़ रुपये दिए, जिससे बिना एक पैसा लगाए उसे कुल 143 करोड़ रुपये का लाभ मिला। अब इस हिसाब से हर ज़िले को किए गए भुगतान और कंपनी को हुए लाभ का अनुमान लगाया जा सकता है। साईंनाथ का दावा था/है कि फसल बीमा योजना राफेल से बड़ा घोटाला है। बकौल साईनाथ पिछले 20 सालों में हर दिन दो हज़ार किसान खेती छोड़ रहे हैं। ऐसे किसानों की संख्या लगातार घट रही है जिनकी अपनी खेतीहर ज़मीन हुआ करती थी और ऐसे किसानों की संख्या बढ़ रही है जो किराये पर ज़मीन लेकर खेती कर रहे है। इन किरायेदार किसानों में 80 प्रतिशत क़र्ज़ में डूबे हुए हैं। किसान धीरे-धीरे कॉरपोरेट घरानों के हाथों अपनी खेती गंवाते जा रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र में 55 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) भी नकद मुंबई में बांट रहा है जहां खेती-किसानी है ही नहीं। जब महाराष्ट्र की स्थिति यह है तो पूरे देश में किसानों के नाम पर केंद्र व राज्य सरकारों ने बीमा की आड़ में कितना धन निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों को दिया गया। जबकि सरकारी बीमा कंपनियों को इस योजना में कतई काम नहीं मिला। जबकि रिलायंस और एस्सार जैसी चुनिंदा कंपनियों को फसल बीमा देने का काम दिया गया है। कुछ इसी तरह की प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना का हाल है जिसमे सरकार की और से बीमा राशि निजी क्षेत्र की कंपनियों को दी जा रही है। सरकार की एक और महत्वाकांक्षी उज्जवला योजना का जितना प्रचार किया गया और किया जा रहा है और सरकार जिसे अपनी बड़ी सफलता बता रही है और इसे चुनावों में उपलब्धि के रूप में गिना रही है वहीं देशभर में अभी भी अधिकतर ग्रामीण इलाकों में चूल्हे का इस्तेमाल हो रहा है। रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कम्पैसिनेट इकोनॉमिक्स (RICE) के एक नए अध्ययन से पता चलता है कि ग्रामीण बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 85% उज्ज्वला लाभार्थी अभी भी खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन का उपयोग करते हैं, और इसा सबसे बड़ा कारण वित्तीय असमानता है। लोगों के पास गैस सिलेंडर खरीदने के लिए पैसे ही नहीं हैं। वैसे उज्जवला को भी सरकार ने चरणबद्ध तरीके से लागू किया और जहां-जहां जिन राज्यों में विधान सभा चुनाव होने थे वहां-वहां क्रमश: सिलेंडर बांटे गये और उसका राजनीतिक लाभ भी भाजपा को मिला।
अब सार्वजनिक क्षेत्र की सरकारी कंपनियों की दशा-दुर्दशा पर सरसरी नजर डालें तो एयर इंडिया, महानगर टेलीफ़ोन निगम (एमटीएनएल) लिमिटेड और भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) बिकवाली की कगार पर हैं जबकि निजी क्षेत्र की विमानन कंपनी जेट एयरवेज को बचाने के लिए सरकार बेताब नजर आ रही है जबकि जी-4 सेवा न दे पाने के कारण एमटीएनएल और बीएसएनएल गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे है। बीएसएनएल के 55 हजार कर्मचारियों पर बेरोजगारी की तलवार लटकी है जो सरकार के रोजगार देने वाले वादे पर एक तमाचे से कम नहीं है।
बीएसएनएल की बरबादी की कहानी साबित करती है कि मोदी सरकार की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है। सरकार ने जियो को आगे बढाने के लिए बीएसएनएल को धीमा जहर दिया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रिलायंस को सिर्फ डेटा सर्विस के लिए लाइसेंस दिया गया था, लेकिन बाद में 40 हजार करोड़ रुपये की फीस की बजाय 1,600 करोड़ रुपये में ही वॉयस सर्विस का लाइसेंस दे दिया गया।
लेकिन जियो के पास संचार ढांचे का अभाव था और यही से मोदी सरकार ने बीएसएनएल के ढांचागत निर्माण को धीरे धीरे जिओ को देना शुरू किया, 2014 में आते ही मोदी सरकार द्वारा एक टॉवर पॉलिसी की घोषणा की ओर दबाव डालकर रिलायंस जिओ इंफोकॉम लिमिटेड से भारत संचार निगम लिमिटेड के साथ मास्‍टर शेयरिंग समझौता करवा दिया। इस समझौते के तहत रिलायंस जिओ बीएसएनएल के देशभर में मौजूद 62,000 टॉवर्स का उपयोग कर सकती थी इनमें से 50,000 में ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी उपलब्ध थी। यह जिओ के लिए संजीवनी मिलने जैसा था क्योंकि वह चाहे कितना भी पैसा खर्च कर लेती इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर नही खड़ा करती थी, लेकिन उसके लिए एक मुश्किल और थी बीएसएनएल भी उसके कड़े प्रतिद्वंद्वी में से एक था जिन्हें इन टॉवर से सिग्नल्स मिलते थे।
इसलिए मोदी सरकार ने ग़जब का खेल खेला उसने जिओ को इन टावर का निरंतर फायदा मिलते रहे इसके लिए इन टावर्स को एक अलग कम्पनी बना कर उसमे डाल दिया गया। मोबाइल टॉवर किसी भी टेलीकॉम ऑपरेटर के लिए सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं इस कदम का परिणाम यह हुआ कि अब बीएसएनएल को भी इन टावर की सेवाएं हासिल करने का किराया लगने लगा, यह निर्णय 2017 में मोदीं सरकार ने लिया था जिससे बीएसएनएल अपने ही टॉवरों की किराएदार बन गयी। नतीजतन जो कम्पनी 2014-15 में 672.57 करोड़ रुपए के फायदे में आ गई थी इस निर्णय के बाद हजारों करोड़ रुपए का घाटा दर्शाने लगी। मोदी सरकार ने बीएसएसएल को 4जी स्पेक्ट्रम भी आवंटित नही किया। लेकिन मोदी सरकार यही नही रुकी उसने उन राज्यों में जहाँ उसकी सरकार थी वहां ऐसी पॉलिसी बनाई जिससे जिओ को फायदा पुहंचे ओर बीएसएनएल को कोई मौका नहीं मिले। छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने एक योजना शुरू की जिसे संचार क्रांति योजना कहा गया 2011 में छत्तीसगढ़ में मोबाईल की पहुंच 29 प्रतिशत थी।
छत्तीसगढ़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों एवं कम जनसंख्या घनत्व के कारण दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियां राज्य में नेटवर्क का विस्तार नहीं कर पा रही थी। संचार क्रांति योजना के तहत इन क्षेत्रों में टेलीकॉम प्रदाता कंपनी द्वारा नेटवर्क कनेक्टिविटी प्रदाय किये जाने हेतु अधोसंरचना तैयार की जानी थी और 1500 से अधिक नये मोबाईल टॉवर लगाये जाने थे 600 करोड़ रुपये मोबाइल टावरों की स्थापना पर खर्च किये जाने थे, यानी सारा काम सरकारी खर्च पर किया जाना था यह ठेका बीएसएनएल के बजाए जियो को दिया गया। अब आप समझ सकते हैं कि देश के जिस गरीब आदमी के उत्थान के लिए मोदीजी और उनकी पार्टी अन्त्योदय योजना का मुखौटा पहनकर गरीबों के हितों के प्रति कितनी समर्पित है।
यह मुद्दे सिर न उठायें इसलिए राष्ट्रवाद का डोज आम देशवासी को दिया जा रहा है जिसके नशे में भय, भूख, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलम्बन के मुद्दे शांत रहें। हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद जैसे विषय इस सरकार की संजीवनी हैं जिन्हें वह कभी नहीं छोड़ सकती। इसीलिए इन दिनों चौकीदार पर ज्यादा जोर है। बाकी राफेल, नोटबंदी. आतंकवाद आदि तो प्रसंग मात्र हैं। 

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