मन्नतें पूरी करती हैं मां तरकुलहा देवी

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तरकुलही, आशीर्वाद के कारण कई बार टूट गया था फ़ासी का फंदा
सत्यप्रकाश सोनी/दोपहर
मुंबई। यू.पी.,गोरखपुर के चौरी चौरा में स्थित मां तरकुलही मंदिर एक ऐतिहासिक मंदिर है जहाँ चैत राममनवमी में दर्शन के लिए यहां दूर दूर से हजारो श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है। उत्तर प्रदेश गोरखपुर से 22 किमी दुरी पर स्थित तरकुलहा देवी मंदिर है। जो देवीपुर ग्राम पंचायत में क्रांतिकारी बंधू सिंह की अटूट आस्‍था की प्रतीक माँ तरकुलहा देवी मंदिर। यह मंदिर अमर शहीद बंधू सिंह से जुड़ा है।कहा जाता है अंग्रेजी हूकूमत के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले बन्धू सिंह छोटी उम्र में प्रथम स्वाधीनता 1857 की लडाई में कूद गए थे। बन्दू सिंह,तरकुलहा जंगल में एक अज्ञात देवी की पूजा करते थे। उन्‍होंने अंग्रेजी हूकूमत के खिलाफ जंग छेड़ दी थी। उनके गुरिल्ला युद्ध से घबड़ाये अंग्रेजों ने मुखबिर के जरिए उन्हें धोखे से पकड़ लिया और 12 अगस्त, 1858 को गोरखपुर के अलीनगर में फांसी दे दी।
तरकुलहा देवी मंदिर मुख्य पुजारी(पण्डित दिनेश त्रिपाठी) के अनुसार छह बार अमर शहीद बंधू सिंह को फॉंसी देने की कोशिश की गई लेकिन माँ का आशिर्बाद होने के कारण फ़ासी का फंदा हर बार टूट गया था। अंग्रेज घबड़ा गये। बाद में सातवीं बार फॉसी देने के समय वीर बन्दू सिंह अपनी अराध्य देवी से कहा था कि *हे मॉ अब आप मुझे जाने दें* तब उनकी गर्दन फंदे से झूल गई। उसी दौरान पिण्डी के पास तरकुल का एक पेड़ जड़ सहित टूट गया। उसकी जड़ से रक्त की धारा निकल पड़ी । इस चमत्कार को देखकर लोग पूजा अर्चना करने लगे। तबसे यहां की देवी का नाम तरकुलहा देवी पड़ गया। बताया कि बंधू सिंह की पिण्डी मंदिर के भीतर ही है। बाद में लोगों के सहयोग से वहां मंदिर परिसर में देवी मॉ की मूर्ति की स्थापना कर मंदिर का निर्माण कराया गया। जहां नवरात्रि में लाखों भक्त माँ के चरणों मे शीश झुकाकर आशीर्वाद लेने जाते है जहां उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

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