चुनाव में चुनाव आयोग की चुनौतियां

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आदर्श चुनाव आचार संहिता के नियमों पर बात करे तो कई सारे नियम है तथा फ़ेहरिस्त लम्बी है पर मुख्य रूप से फोकस वाले नियम है ,पहला सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर रोक ताकि किसी राजनीतिक दल या राजनेता को चुनावी लाभ ना मिले। दूसरा सरकारी गाड़ी, सरकारी विमान या सरकारी बंगले के इस्तेमाल की मनाही चुनाव प्रचार के लिए होती है।तीसरा वोटरों को रिझाने के लिए किसी भी तरह की सरकारी घोषणाओं, लोकार्पण, शिलान्यास की मनाही।चौथा किसी भी राजनीतिक रैली से पहले पुलिस की अनुमति ज़रूरी होती है।पांचवा धर्म के नाम पर वोट मांगने की मनाही और इस साल तो आयोग ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण सत्यापन के बाद ही सोशल मीडिया पर विज्ञापन लगाने के भी आदेश दिए है।

शिवांशु राय
चुनावी रणभेदी बज चुकी है। सभी राजनीतिक पार्टियां ,राजनेता और कार्यकर्ता कमर कस चुके है।इन आम चुनाव के लिए जिस बेसब्री से सबको इंतजार था वो अब खत्म हो चुका है और चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गयी है जिसके साथ ही अब राजनीतिक दलों और राजनेताओं को कुछ खास नियमो का पालन करना पड़ रहा हैं ,और नियमों को तोड़ने पर कड़ाई से कार्यवायी करने के भी सख्त आदेश चुनाव आयोग के तरफ से दिए गए है।स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग पूरी तरह कमर कस चुका है और अनेक हिदायत और नियम आयोग की तरफ से तथा आदर्श आचार संहिता के अनुसार दिये जा रहे है जिनका सिर्फ एक लक्ष्य एवम संकल्प है, नियमबद्ध ,पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव, जिसके लिए वह पूरी तरह तत्पर और प्रतिबद्ध है।
आदर्श चुनाव आचार संहिता के नियमों पर बात करे तो कई सारे नियम है तथा फ़ेहरिस्त लम्बी है पर मुख्य रूप से फोकस वाले नियम है ,पहला सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर रोक ताकि किसी राजनीतिक दल या राजनेता को चुनावी लाभ ना मिले।दूसरा सरकारी गाड़ी, सरकारी विमान या सरकारी बंगले के इस्तेमाल की मनाही चुनाव प्रचार के लिए होती है।तीसरा वोटरों को रिझाने के लिए किसी भी तरह की सरकारी घोषणाओं, लोकार्पण, शिलान्यास की मनाही।चौथा किसी भी राजनीतिक रैली से पहले पुलिस की अनुमति ज़रूरी होती है।पांचवा धर्म के नाम पर वोट मांगने की मनाही और इस साल तो आयोग ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण सत्यापन के बाद ही सोशल मीडिया पर विज्ञापन लगाने के भी आदेश दिए है। चुनाव के दौरान लागू इस अचार संहिता के नियमो और जमीनी वास्तविकता पर प्रकाश डाले तो दोनों के बीच एक गहरी खाई नज़र आती है जो सिर्फ व सिर्फ लोभ-लालच, जागरूकता का अभाव और राजनैतिक दबाव के कारण अस्तित्व में है।यही कारण है की दिनों- दिन भारतीय राजनीति में असन्तुलन बढ़ता जा रहा हैं।जाहिर सी बात है कि राजनीति में असन्तुलन बढ़ने के बाद असन्तोष और अस्वीकार्यता का बढ़ना लाज़मी है।
लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों के लिये आचार संहिता के नियमो के अनुसार धन व्यय की अधिकतम सीमा 70 लाख है साथ ही हर खर्च का ब्यौरा के साथ-साथ उम्मीदवार को पांच साल का इनकम टैक्स रिटर्न और सम्पत्ति सम्बधी सारी जानकारी जिला निर्वाचन अधिकारी के पास देनी होती है।नियमो के अतिक्रमण करने पर भारतीय दंड संहिता धारा 170 के तहत कार्यवायी की जाती है परंतु हकीकत पर नजर डाले तो क्या यह वास्तविकता है कि सभी उम्मीदवार 70 लाख ही चुनाव के दौरान खर्च करते हैं? इसी बाबत में पिछले महीने 22 फ़रवरी को एक अमेरिकी थिंकटैंक कार्नेगी एंडामेन्ट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस थिंकटैंक के वरिष्ठ फ़ेलो और निदेशक मिलन वैष्णव ने बताया था और चिंता जाहिर की थी कि आने वाला लोकसभा का चुनाव दुनिया के इतिहास में सबसे महंगा चुनाव साबित होगा।उन्होंने बताया कि 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और कांग्रेस के चुनाव में कुल 4.62 खरब रुपये खर्च हुए थे वही 2014 में भारत मे आम चुनावों में 3.55 खरब रुपये खर्च हुए थे जिसके आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा कि आने वाला चुनाव में सबसे अधिक पैसा खर्च किया जाएगा।मिलन यह भी कह रहे है कि सत्तारूढ़ और विपक्ष कांटे की टक्कर देने के लिए बेहिसाब पैसा बहायेगी।बारीकी से देखे तो भारतीय राजनीति में पैसा के बढ़ते वर्चस्व का मुख्य कारण यह है की राजनीतिक चंदा लेनदेन में पारदर्शिता की भारी कमी है।यह पता लगाना काफी मुश्किल होता है कि किस पार्टी या राजनेता को कितने रुपये चंदा मिला।दानदाता भी डर के चलते चंदे का खुलासा नही करते है।पैसा प्राप्त करने का कई जरिया होता हैं जैसे छोटी बड़ी मुखौटा कंपनियों के माध्यम से या ठेके या टेंडर के कार्यो से प्राप्त कमीशन से।इसके अलावा राजनेता कुछ विश्वसनीय लोगों से नगदी के रूप में पैसा खर्च करवाते है जिसका कोई सरकारी रिकॉर्ड नही रहता है।यही अवैध पैसा सारे राजनैतिक व्यवस्था को अस्थिर कर देता है।चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद राजनेता क्यों गरीब जनता को भूल जाते है?इस सवाल का जवाब भी इन्ही अवैध पैसों और उसके सप्लायरों में छुपा है।
भारतीय राजनीति में राजनीतिक हित और फायदे के लिए धर्म और सोशल मीडिया का इस्तेमाल दोनों एकदूसरे से जुड़ती हुई चली जा रही है खासकर चुनाव के समय में क्योंकि आचार संहिता लागू होने के बाद खुले तौर पर कोई भी नेता वोट मांगने के लिए धर्म का इस्तेमाल नही कर सकता हैं परन्तु जमीनी हकीकत कुछ और ही है क्योंकि घर-घर जाकर नेता खूब धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगते हैं।यही हाल सोशल मीडिया पर भी हैं। राजनीतिक पार्टियां या नेता अचार संहिता में खुले तौर पर सोशल मीडिया पर बिना सत्यापन के विज्ञापन नही लगा सकते है तो उन्होंने इससे बचने के लिए एक तरीका ईजाद किया है ,अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के माध्यम से अपनी बात को वायरल करवाना तथा अपने पक्ष में एजेंडा चलाना क्योंकि ये सबको ज्ञात है कि भारत मे सोशल मीडिया का बड़ा वर्चस्व है। पीयू रिसर्च की 2018 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक 20 फीसदी वयस्क भारत मे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते है इस तरह राजनीतिक दल सीधे 18 करोड़ मतदाताओं तक सोशल मीडिया से पहुँच बना रहे है। इस बात को राजनीतिक पार्टियां अच्छे से समझ रही है ,यही कारण है कि कुछ ही महीने पहले सोशल मीडिया पर सक्रिय न रहने वाली पार्टियां भी अब सोशल मीडिया पर आ गयी है। समस्या यह है कि सभी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर सारे फर्जी एकाउंटस ,फ़र्ज़ी खबरें और भड़काऊ पोस्ट्स की एक समय में निगरानी रख पाना मुश्किल है अतः इसी बात का फायदा कुछ असामाजिक तत्व उठाकर चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं।
अतः चुनाव आयोग के सामने इस चुनाव में सबसे बडी चुनौती यह है कि चुनाव में पैसा के बढ़ते वर्चस्व को रोकना क्योंकि यही अवैध पैसा आम लोग, सत्ता तथा राजनेताओं के बीच में खाई बन रहा है।इससे भी बढ़कर आयोग के सामने सोशल मीडिया पर निगरानी के साथ-साथ उसके दुरुपयोग को रोकने की चुनौती है।इन चुनावी आलम में हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि हम सबको जागरूक होकर तथा सबको जागरूक कर देश के भविष्य,उन्नति और विकास के लिए बिना किसी के बहकाओ में आये बिना अपने मनमुताबिक वोट करना है तथा देश हित मे लोकतांत्रिक व्यवस्था अक्षुण्ण बनाये रखना है तभी जाकर ‘सशक्त भारत, समर्थ भारत’ का निर्माण होगा।
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