कर्मयोगियों के जीवन में अनुशासन महत्वपूर्ण होता है

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दोपहर संवाददाता
मुंबई। भांडुप (प) के एलबीएस मार्ग स्थित शांग्रीला बिस्किट कंपनी के सामने नित्यानंद माऊली हॉल, नित्यानंद मंदिर में प्रतिदिन सायं 5 से 8 बजे के बीच चल रहे मानस ज्ञानयज्ञ के दौरान चतुर्थ दिवस आचार्यचरण अनंतश्री विभूषित काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराजश्री ने कहा कि, धर्म रक्षा के लिए ही महापुरुषों का अवतार होता है।
दशरथ एवं कौशिल्या ने तपस्या किया तो भगवान स्वयं राम के रूप में अवतरित हुए। कोई भी नर-नारी जब तपस्या करेगा तो वहाँ पर योग्य संतान पैदा होगी। यह प्राचीन युग का सत्य नहीं है, हर युगों का सत्य है। माता-पिता संयम रखेंगे, तपस्या करेगें, ईश्वर पर निष्ठा होगी, कर्तव्यपरायणता होगी, धर्म-गुरु-शास्त्र में श्रद्धा होगी तो उसकी संतान दैवी जरूर पैदा होगी। आज के परिवेश में दैवी संतानों की अधिक आवश्यकता है। उन्हीं के द्वारा धर्म का रक्षण होता है। वाशनावशवर्ती होकर मनुष्य जब कर्म करता है तो वह आसुरी सम्पदा का परिचायक है एवं शास्त्रानुसार जो कर्म करता है वह दैवी सम्पदा का परिचायक है। अस्तु, दैवी सम्पदा से जीवनयापन करने वाले माता-पिता के यहाँ स्वयं भगवान एवं महापुरुष जन्म लेते हैं।
पूज्य शंकराचार्य जी ने बताया कि, कर्मयोगी के जीवन में मानसिक अनुशासन का बहुत अधिक महत्व है। मन तथा शरीर का पारस्परिक संबंध है। मन के चिंतन का शरीर पर तथा शरीर के स्वास्थ्य का मन पर प्रभाव पड़ता है। मन के सुखी अथवा दुःखी होने पर शरीर स्वस्थ अथवा शिथिल हो जाता है तथा शरीर के स्वस्थ अथवा अस्वस्थ होने पर मन प्रसन्न अथवा उदास हो जाता है, किन्तु वास्तव में मन शरीर पर शासन करता है तथा शरीर पर मन का ही प्रभुत्व होता है। मानसिक अनुशासन से अर्थात मन को संयत एवं नियंत्रित करने से शरीर को नियंत्रित करना संभव होता है।
कर्मयोगी अपने मन एवं इंद्रियों को संयत एवं नियंत्रित रखकर ही प्रभोलनों पर विजय प्राप्त कर सकता है तथा कर्तव्य मार्ग में दृढ़ रह सकता है। सांसारिक पदार्थों की आसक्ति चित्त को चंचल एवं अशांत कर देती है तथा आसक्ति ग्रस्त मनुष्य न कोई उत्तम उपलब्धि कर सकता है और न ही शांति पा सकता है।
आसक्ति ही मोह का रूप धारण करके मनुष्य के विवेक का हरण कर लेती है तथा बुद्धि को असंतुलित कर देती है। मोह के कारण मनुष्य भावुक होकर कर्तव्य भ्रष्ट हो जाता है। कर्मयोगी सहृदय एवं करुणाशील तो होता है, किन्तु भावुकता के प्रवाह में नहीं बहता। उत्तम भावना विकृत होकर भावुकता बन जाती है।

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