असफल तकनीक एवं कृषि समस्याएं

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इजराइल की कृषि तकनीकों तथा लाखों-करोड़ों रुपए के पॉली हाउस से भारतीय खेती का कुछ खास भला नहीं होने वाला

कीटनाशकों ने पर्यावरण को ही प्रदूषित नहीं किया, बल्कि स्वारथ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर दिया है । कीटनाशकों की अनेक नई किस्में किसानों के लिए बर्बादी लेकर आ रही है । कृषि वैज्ञानिक इसे ‘तकनीकी थकान’ बता रहे हैं । शायद यह तकनीकी असफलता को दिया गया शालीन नाम है । हरित क्रांति का गढ़ कहे जाने वाले पंजाब का मामला देखिए । 138 ब्लाकों में से 108 पहले भी भूजल के स्तर के मामले में डार्क जोन घोषित कर दिए गये हैं । इन क्षेत्रों में भूजल के दोहन का स्तर खतरे के निशान 80 प्रतिशत को भी पारकर 97 प्रतिशत तक पहुंच गया है । जितने अधिक भूजल का दोहन किया जायेगा, खेती की लागत उतनी ही बढ़ती जायेगी । पानी के लिए किसानों को अधिक गहराई तक बोर करना पडेगा, जिससे ट्‌यूबवेल लगाने का खर्च बढ़ जायेगा । उत्तर प्रदेश में भी स्थिति इतनी ही नाजुक है।

असफल कृषि तकनीकों ने किया खेती का बंटाढार
लाखों रुपए के अनुदान का लालच दिखाकर पॉली हाउस बनाने वाली कंपनियों के एजेंट किसानों को अपने जाल में फँसाते हैं और फिर शुरू होता है सब्सिडी अभिज्ञान का खेल,जिसमें हर मोड़ पर घूस का चढ़ावा दिया जाता है और प्राय: घटिया दर्जे के पॉली हाउस तैयार करके थमा दिए जाते हैं, जो पहली या दूसरी बारिश में ही जवाब दे जाते हैं। ऐसे एक नहीं, कितने ही उदाहरण मौजूद हैं, जहाँ किसान अब अपना सब कुछ गवां कर कर्ज़ के जाल में फँसकर फड़फड़ा रहे हैं और बिना अपनी कीमती जमीन को बेचे उन्हें इसमें से निकलने की कोई राह नहीं दिख रही है। जाहिर है कि हाईटेक अथवा उच्च तकनीकीयुक्त खेती के नाम पर विदेशों की अंधानुकरण है की प्रवृत्ति के चलते सरकार तथा किसान दोनों को चूना लगाया जा रहा है।

भारत की अधिकतर जनसंख्या गावों में रहती है, जहाँ अनेक प्रकार के खाद्यान्नों का उत्पादन किया जाता है । भोजन मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है ।
अत: खाद्यान्नों का सीधा सम्बन्ध जनसंख्या से है । भारत की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। इस प्रकार बढ़ती हुई जनसंख्या को भोजन खिलाने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया और पश्चिमी देशों की तर्ज पर 1966-67 में हरित क्रांती का अभियान चलाया गया और “ अधिक अन्न उपजाओ ” का नारा दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप अधिक उपज प्राप्त करने के लिए रासायनिक खाद, रासायनिक कीटनाशकों एवं रासायनिक खरपतवारनाशकों के कारखाने लगाये गए। रासायनिक खाद, रासायनिक कीटनाशकों एवं रासायनिक खरपतवारनाशकों का अन्धाधुन्ध व असन्तुलित उपयोग प्रारम्भ हुआ ।1966-67 की हरित क्रांति हुए पैंतालिस साल से अधिक बीत चुके हैं ।
इस बीच सघन खेती के लगभग सभी क्षेत्रों में भूजल स्तर रसातल मे पहुँच गया है । रासायनिक खादों ने जमीन नष्ट करनी शुरू कर दी है ।
कीटनाशकों ने पर्यावरण को ही प्रदूषित नहीं किया, बल्कि स्वारथ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर दिया है । कीटनाशकों की अनेक नई किस्में किसानों के लिए बर्बादी लेकर आ रही है । कृषि वैज्ञानिक इसे ‘तकनीकी थकान’ बता रहे हैं । शायद यह तकनीकी असफलता को दिया गया शालीन नाम है ।
हरित क्रांति का गढ़ कहे जाने वाले पंजाब का मामला देखिए । 138 ब्लाकों में से 108 पहले भी भूजल के स्तर के मामले में डार्क जोन घोषित कर दिए गये हैं । इन क्षेत्रों में भूजल के दोहन का स्तर खतरे के निशान 80 प्रतिशत को भी पारकर 97 प्रतिशत तक पहुंच गया है ।
जितने अधिक भूजल का दोहन किया जायेगा, खेती की लागत उतनी ही बढ़ती जायेगी । पानी के लिए किसानों को अधिक गहराई तक बोर करना पडेगा, जिससे ट्‌यूबवेल लगाने का खर्च बढ़ जायेगा । उत्तर प्रदेश में भी स्थिति इतनी ही नाजुक है ।
केंद्रीय भूजल बोर्ड ने अधिक दोहन के कारण भूजल का स्तर खतरनाक स्थिति में पहुंचाने वाले 22 ब्लाकों की पहचान की है । इनमें से 19 ब्लाक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है । गन्ना उत्पादक किसान, जो मिलों के साथ गन्ना आपूर्ति का बांड भरते हैं, की फसल हर साल 240 क्यूबिक मीटर पानी पी जाती है।
गेहूं और चावल के मुकाबले यह करीब ढाई गुना अधिक है। गिरता भूजल स्तर जमीन को अनुत्पादक और बंजर बना देता है। राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भू उपयोग नियोजन ब्यूरो का अनुमान है कि देश की कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से 12 करोड़ हेक्टेयर भूमि अलग-अलग तरह से ह्रास का शिकार हो रही है।
खाध्यान्न के समान उत्पादन के लिए जितनी भूमि की जरूरत होती उसमें से हरित क्रांति के जरिए 580 लाख हेक्टेयर भूमि बचा ली गयी है । आज चालीस साल बाद यह सामने आ रहा है कि हमने इससे दोगुनी भूमि पर्यावरणीय दृष्टि से बर्बाद कर दी । यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हम जिस कृषि तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्या उसी में गड़बड़ी है? सालों तक हमें बताया जाता रहा कि फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद बहुत जरूरी है।
शुरुआती दौर में रासायनिक खाद ने पैदावार जरूर बढाई, लेकिन इसके साथ-साथ कृषि भूमि रोगग्रस्त और अनुपजाऊ हो गयी। पर्यावरण के विश्वस के निशान दृष्टिगोचर थे, लेकिन खेतों की कम हो रही उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद कंपनियों के खाद से खेत पाट दिए। जैसे इतना ही काफी न हो, भूजल में नाइट्रेट मिलते जाने से जन-स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बढ़ता ही जा रहा है। अब यह साबित हो गया है कि दस साल पहले जितनी फसल लेने के लिए उस समय की तुलना में दोगुनी खाद डालनी पड़ रही है। इससे किसान कर्ज के जाल में फंस रहे हैं। हालिया अध्ययन में खाद की खपत और उत्पादन के बीच नकारात्मक सह-संबंध के बारे में साफ-साफ बताया गया है।
जिन क्षेत्रों में खाद की खपत कम है वहां फसल की उपज अधिक है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि खाद कंपनियों को कभी ऐसे निर्देश नहीं दिए गये कि वे मिट्टी के पोषक तत्वों में सतुलन का ध्यान रखें, ताकि विविध प्रकार से भूमि में रासायनिक तत्वों का जमावड़ा न हो ।
किसानों द्वारा फसलों पर कीटनाशकों का छिड़काव किया जाना भी आधुनिक खेती का अभिन्न अंग है। चावल और अन्य फसलों पर कीटनाशक छिड़कना इसलिए जरूरी हो गया, क्योंकि खाद की जरूरत वाली ऐसी बौनी प्रजातियां तैयार की गयी जिनके प्रति कीट आकर्षित होते थे। कीटनाशक सही जगह तक पहुंचे, इसके लिए किसानों की कमर पर कीटनाशकों से भरी केन लाद कर स्प्रे मशीन से फसलों पर छिड़काव करने के लिए कहा गया। इन स्प्रे मशीन से फसलों की अलग-अलग फसल के अनुकूल विविध प्रकार की नली बनी होती है। कुछ फसलों के लिए ट्रैक्टर से भी छिड़काव किये जाते हैं।
कार्नेल युनिवर्सिटी के डेविड पीमेंटल ने 1980 के शुरू में निष्कर्ष निकाला था कि केवल 0.01 प्रतिशत कीटनाशक सही तरह कीट तक पहुंचता है, जबकि प्रतिशत पर्यावरण में मिल जाता है। इसके बावजूद किसानों को और अधिक स्प्रे करने के लिए कहा गया।
अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान ने भी कीटनाशकों के सही इस्तेमाल पर शोधपत्र जारी किया है। अध्ययन से यह सामने आया है कि इस बात से कीटनाशक की क्षमता का कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि उसका छिड़काव मशीन से किया जाता है या फिर कीटनाशकों को सिंचाई के पानी के स्रोत पर रख दिया जाता है।
वर्तमान में ग्रामीण भारत के हर कोने पर मौजूद संकट फौरी कृषि तकनीकों का परिणाम है, जिनका सामाजिक सरोकार से कोई वास्ता नहीं । यह देखने की जरूरत महसूस नहीं की जाती कि तकनीक खेत के क्षेत्रफल, बदलते कृषि-वातावरण, पर्यावरण और इन सबसे बढकर कृषक समुदाय के हित में हैं या नहीं? अब भी समय है कि हम इन तकनीकों की समीक्षा करें और इनके कारण होने वाली परेशानियों से छुटकारा पाने के उपायों पर विचार करें।
आंख मूंदकर विदेशों से आयातित तकनीकों को स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति किसानों पर बहुत भारी पड़ रही है।
वास्तव में इन महंगी तकनीकों के प्रलोभन ने कृषक समुदाय की खाल ही उतार दी है। फसल उगाने से बचने वाली रकम इन असंगत तकनीकों की खरीद और रख-रखाव में चली जाती है। इससे खेती पर संकट बढ़ता गया है।
जरूरत है भारतीय तकनीकों के विकास की, जो सस्ती, उपयोगी और पर्यावरण हितैषी हों।

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